गण 62 — लौगाक्षयः

लौगाक्षयः गण कश्यप ऋषि-कुल का गण है। बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण के अनुसार इसका प्रवर है — काश्यप, आवत्सार, वासिष्ठ। सूत्रों में इसके 1 और रूप भी मिलते हैं। ग्रंथ ने इस गण में 39 नाम दर्ज किए हैं।

संक्षेप में

लौगाक्षयः गण कश्यप ऋषि-कुल का गण है। बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण के अनुसार इसका प्रवर है — काश्यप, आवत्सार, वासिष्ठ। सूत्रों में इसके 1 और रूप भी मिलते हैं। ग्रंथ ने इस गण में 39 नाम दर्ज किए हैं।

प्रवर

प्रवरऋषिकिस ग्रंथ के अनुसार
काश्यप · आवत्सार · वासिष्ठ3बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराणतालिका का मुख्य
वासिष्ठ · आवत्सार · काश्यप3बौधायनविकल्प

स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 199 — “Vatsara, Kashyapa, Vasishtha”. यह ऊपर दिए मत्स्य पाठ से मेल खाता है।

लौगाक्षि "द्व्यामुष्यायण" (दो गोत्र वाले) माने गए हैं — कश्यप और वसिष्ठ दोनों से जुड़े. इसीलिए प्रवर में दोनों कुलों के ऋषि हैं.

इस गण में दर्ज नाम (39)

गोत्र-प्रवर ग्रंथों के अनुसार एक गण के गोत्रों में आपस में विवाह वर्जित माना गया है। सूची ग्रंथ में जैसी छपी है, वैसी ही है। नाम के आगे लिखे संकेत बताते हैं कि वह नाम किस ग्रंथ की सूची में है।

  1. 1अनसूयःम
  2. 2अनुष्ठेयाः ?म
  3. 3आकुलयःका
  4. 4आनडुयः ?का
  5. 5उद्वाहिःम
  6. 6कापुटिःका
  7. 7कौद्रुगाक्षिः ?म
  8. 8नाकुरयःम
  9. 9पिङ्गाक्षिःका
  10. 10फाजिलयःका
  11. 11भाकुरयःम
  12. 12यामुनिःम
  13. 13राजवर्त्मयः ?म
  14. 14राजवर्तपःम
  15. 15राजवाहिःका
  16. 16राजसेकिःका
  17. 17राजसेवकिःका
  18. 18रावफालयःका
  19. 19रावलयःका
  20. 20रूपवत्सकिःम
  21. 21रोदबर्हिःम
  22. 22रोपसेवकिःम
  23. 23लौगाक्षिःका
  24. 24शरद्वन्तःका
  25. 25शाकबलयःका
  26. 26शाकलियःका
  27. 27शैशिरःम
  28. 28सजातबिःम
  29. 29सजातम्बिःम
  30. 30सरतवःका
  31. 31साकलयःका
  32. 32सामुचिःका
  33. 33साम्रागणिःम
  34. 34सासुचिःका
  35. 35सैरन्ध्रिःम
  36. 36सैरिपिःम
  37. 37सौद्रपिङ्गाक्षिःम
  38. 38सौरन्ध्रिःका
  39. 39स्तानयःम

संकेत: आश्व = आश्वलायन · आप = आपस्तम्ब · बो = बौधायन · का = कात्यायन · म = मत्स्य पुराण. "?" = मूल छपाई साफ़ नहीं, नाम की पढ़त अनिश्चित।

कश्यप-कुल के अन्य गण

स्रोत

पी. चेन्सल राव (सं.), गोत्रप्रवरनिबन्धकदम्बम् (1900), "प्रवराः, गोत्रगणाश्च", पृष्ठ 271–272 (archive.org leaf 311–312)।