समय
30 सेकंड
जप संख्या
108
कठिनाई
मध्यम
शुभ दिन
बुधवार व एकादशी
उद्देश्य:इंद्रिय-संयम (Discipline)आध्यात्मिक उन्नति (Spiritual Growth)मन की शांति (Peace)
✓ संपूर्ण नाम जाप
ॐ हृषीकेशाय नमः श्री कृष्ण चतुर्विंशति नामावली का नाम 10 है। “हृषीक” अर्थात् इंद्रियाँ और “ईश” अर्थात् स्वामी — यानी इंद्रियों के स्वामी। भगवद्गीता 1.15 में यही नाम आता है। परंपरा में इसे इंद्रिय-संयम व ध्यान-साधना का मंत्र माना जाता है।
FAQ
ॐ हृषीकेशाय नमः — सामान्य प्रश्न
हृषीकेश "हृषीक" (इंद्रियाँ) और "ईश" (स्वामी) से बना है — अर्थात् इंद्रियों के स्वामी। एक अन्य व्याख्या में "हृषीक" को हर्ष से जोड़कर इसका अर्थ आनंद के स्वामी भी लिया जाता है।
हाँ। भगवद्गीता 1.15 में आता है — "पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः", अर्थात् हृषीकेश ने पाञ्चजन्य शंख बजाया और अर्जुन ने देवदत्त। गीता में जहाँ इंद्रिय-निग्रह की बात आती है, वहाँ यह नाम विशेष अर्थपूर्ण हो जाता है।
उत्तराखंड का ऋषिकेश नगर, जो गंगा तट पर योग-साधना का प्रसिद्ध केंद्र है, परंपरा में इसी "हृषीकेश" नाम से जुड़ा माना जाता है।
क्योंकि एक ही शब्द में "ष" (मूर्धन्य) और "श" (तालव्य) दोनों अलग-अलग आते हैं, तथा आरंभ में ऋ-कार है। "हृ-षी-के-शाय" के अंशों में तोड़कर धीमे अभ्यास से आरंभ करना उपयुक्त बताया जाता है।
परंपरा में इस मंत्र का जप 108 बार — अर्थात एक माला — करने का विधान कहा जाता है, और इसके लिए तुलसी माला का प्रयोग बताया जाता है। जप का सुझाया गया समय ब्रह्म मुहूर्त है। संख्या से अधिक महत्व नियमितता तथा शुद्ध उच्चारण का माना गया है — प्रतिदिन एक माला, बीच-बीच में छोड़कर की गई अधिक संख्या से श्रेष्ठ कही जाती है।
परंपरा में इसके लिए बुधवार व एकादशी विशेष कहे जाते हैं। दैनिक जप का सुझाया गया समय ब्रह्म मुहूर्त है। इसके अतिरिक्त परंपरा में ये अवसर बताए जाते हैं — ब्रह्म मुहूर्त में ध्यान से पूर्व; योग या साधना आरंभ करते समय; बुधवार व एकादशी को; प्रातः-संध्या नित्य वंदन में। सामान्य नियम यह कहा जाता है कि समय जो भी चुनें, वह प्रतिदिन एक ही रहे — इससे जप में स्थिरता आती है।
यह नाम-मंत्र है, अर्थात इष्ट के नाम का जप। परंपरा में नाम-जप के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं मानी जाती — इसे स्त्री-पुरुष, किसी भी आयु व किसी भी वर्ग का व्यक्ति श्रद्धापूर्वक जप सकता है। यही नाम-मार्ग की विशेषता कही जाती है कि इसमें पात्रता की शर्त भाव है, विधि नहीं।
पर्व
