समय
30 सेकंड
जप संख्या
108
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
बुधवार, एकादशी व रथ यात्रा
उद्देश्य:भक्ति व प्रेम (Love)मोक्ष (Liberation)रक्षा (Protection)
✓ संपूर्ण नाम जाप
ॐ जगन्नाथाय नमः श्री कृष्ण अष्टोत्तर शतनामावली का नाम 86 है, जिसका अर्थ है “जगत् के स्वामी को नमस्कार”। पुरी का श्री जगन्नाथ मंदिर चार धामों में से एक है, जहाँ भगवान बलभद्र व सुभद्रा सहित विराजते हैं। आषाढ़ शुक्ल द्वितीया की रथ यात्रा इसका सबसे बड़ा पर्व है।
FAQ
ॐ जगन्नाथाय नमः — सामान्य प्रश्न
जगन्नाथ "जगत्" और "नाथ" की संधि से बना है — अर्थात् "जगत् के स्वामी"। यह नाम कृष्ण को समस्त संसार का अधिपति बताता है और श्री कृष्ण अष्टोत्तर शतनामावली में क्रम 86 पर आता है।
पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर में भगवान अकेले नहीं, अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजते हैं। यह त्रिमूर्ति उपासना उपमहाद्वीप में अनोखी मानी जाती है, इसलिए जप में तीनों का साथ स्मरण किया जाता है।
आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को होने वाली रथ यात्रा इस स्वरूप का सबसे बड़ा पर्व है, जिसमें भगवान स्वयं मंदिर से बाहर निकलकर भक्तों के बीच आते हैं। उस दिन इस नाम-मंत्र का जप विशेष माना जाता है।
विग्रह काष्ठ के बने होते हैं और उनका स्वरूप सामान्य मूर्तियों जैसा नहीं होता। परंपरा में इसे इस भाव से पढ़ा जाता है कि परम तत्त्व को किसी आकार में पूरी तरह बाँधा नहीं जा सकता।
परंपरा में इस मंत्र का जप 108 बार — अर्थात एक माला — करने का विधान कहा जाता है, और इसके लिए तुलसी माला का प्रयोग बताया जाता है। जप का सुझाया गया समय प्रातः व संध्या है। संख्या से अधिक महत्व नियमितता तथा शुद्ध उच्चारण का माना गया है — प्रतिदिन एक माला, बीच-बीच में छोड़कर की गई अधिक संख्या से श्रेष्ठ कही जाती है।
परंपरा में इसके लिए बुधवार, एकादशी व रथ यात्रा विशेष कहे जाते हैं। दैनिक जप का सुझाया गया समय प्रातः व संध्या है। इसके अतिरिक्त परंपरा में ये अवसर बताए जाते हैं — रथ यात्रा (आषाढ़ शुक्ल द्वितीया) पर; बुधवार व एकादशी को; जन्माष्टमी पर; पुरी यात्रा या चार धाम संकल्प पर। सामान्य नियम यह कहा जाता है कि समय जो भी चुनें, वह प्रतिदिन एक ही रहे — इससे जप में स्थिरता आती है।
यह नाम-मंत्र है, अर्थात इष्ट के नाम का जप। परंपरा में नाम-जप के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं मानी जाती — इसे स्त्री-पुरुष, किसी भी आयु व किसी भी वर्ग का व्यक्ति श्रद्धापूर्वक जप सकता है। यही नाम-मार्ग की विशेषता कही जाती है कि इसमें पात्रता की शर्त भाव है, विधि नहीं।
पर्व
