समय
30 सेकंड
जप संख्या
108
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
बुधवार व एकादशी
उद्देश्य:संकट मोचन (Relief from Crisis)रक्षा (Protection)मन की शांति (Peace)
✓ संपूर्ण नाम जाप
ॐ जनार्दनाय नमः श्री कृष्ण चतुर्विंशति नामावली का नाम 21 है। इसके दो अर्थ साथ चलते हैं — दुष्ट जनों का मर्दन करने वाले, तथा वे जिनसे समस्त जन याचना करते हैं। भगवद्गीता के प्रथम अध्याय में अर्जुन इसी नाम से कृष्ण को सम्बोधित करते हैं।
FAQ
ॐ जनार्दनाय नमः — सामान्य प्रश्न
दो अर्थ साथ चलते हैं। "जन" + "अर्दन" से एक अर्थ है दुष्ट जनों का मर्दन करने वाले; और "अर्दन" को याचना के अर्थ में लेने पर दूसरा अर्थ है वे जिनसे समस्त जन अपनी कामनाएँ माँगते हैं। परंपरा में दोनों अर्थ पूरक माने जाते हैं।
हाँ। भगवद्गीता के प्रथम अध्याय में अर्जुन कृष्ण को "जनार्दन" कहकर सम्बोधित करते हैं, उस क्षण जब वे युद्ध के परिणाम पर प्रश्न उठा रहे होते हैं।
परंपरा में इसे प्रातः-संध्या नित्य वंदन का नाम माना जाता है। साथ ही संकट, विपत्ति या असहायता के समय प्रार्थना-भाव से इसका जप विशेष रूप से बताया जाता है।
प्रार्थना-भाव से — क्योंकि नाम का एक अर्थ ही "जिनसे याचना की जाए" है। परंपरा में जप के अंत में अपनी प्रार्थना मन ही मन निवेदित करने की बात कही जाती है।
परंपरा में इस मंत्र का जप 108 बार — अर्थात एक माला — करने का विधान कहा जाता है, और इसके लिए तुलसी माला का प्रयोग बताया जाता है। जप का सुझाया गया समय प्रातः व संध्या है। संख्या से अधिक महत्व नियमितता तथा शुद्ध उच्चारण का माना गया है — प्रतिदिन एक माला, बीच-बीच में छोड़कर की गई अधिक संख्या से श्रेष्ठ कही जाती है।
यह नाम-मंत्र है, अर्थात इष्ट के नाम का जप। परंपरा में नाम-जप के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं मानी जाती — इसे स्त्री-पुरुष, किसी भी आयु व किसी भी वर्ग का व्यक्ति श्रद्धापूर्वक जप सकता है। यही नाम-मार्ग की विशेषता कही जाती है कि इसमें पात्रता की शर्त भाव है, विधि नहीं।
"ना" दीर्घ है और "र्द" में "र्" पूर्ववर्ती अक्षर से जुड़ा — "ज-नार्-द-नाय न-मः"। परंपरा में कहा जाता है कि मंत्र-जप में शुद्ध उच्चारण का विशेष महत्व है, इसलिए आरंभ में धीरे-धीरे व स्पष्ट बोलकर अभ्यास करें और गति बाद में बढ़ाएँ।
पर्व
