समय
30 सेकंड
जप संख्या
108
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
बुधवार व एकादशी
उद्देश्य:रक्षा (Protection)संयम व विवेक (Discipline)विजय (Victory)
✓ संपूर्ण नाम जाप
ॐ मधुसूदनाय नमः श्री कृष्ण चतुर्विंशति नामावली का नाम 6 है, जिसका अर्थ है “मधु असुर के संहारक को नमस्कार”। “मधु” का प्रतीकार्थ मीठा प्रलोभन भी लिया जाता है। भगवद्गीता के प्रथम अध्याय में अर्जुन कृष्ण को इसी नाम से पुकारते हैं जब वे युद्ध से विमुख होते हैं।
FAQ
ॐ मधुसूदनाय नमः — सामान्य प्रश्न
मधुसूदन अर्थात् "मधु का संहार करने वाले"। परंपरा में मधु और कैटभ दो असुर माने जाते हैं जिनका वध भगवान ने किया। प्रतीक रूप में "मधु" का अर्थ मीठा प्रलोभन भी लिया जाता है, तब मधुसूदन अर्थात् प्रलोभनों का नाश करने वाले।
गीता के प्रथम अध्याय में जब अर्जुन विषाद में डूबकर स्वजनों के वध से इनकार करते हैं, तब वे कृष्ण को "मधुसूदन" कहकर पुकारते हैं। यह नाम गीता में कई बार आता है, विशेषकर तब जब अर्जुन कोई कठिन प्रश्न रखते हैं।
परंपरा में इसे प्रलोभन, व्यसन और विघ्नों के शमन से जोड़ा जाता है। जप संयम-संकल्प के साथ करने की बात कही जाती है — अर्थात् जिस प्रलोभन से मुक्ति चाहिए, उसे मन में रखकर।
हाँ, यह नाम विष्णु सहस्रनाम में भी आता है। यहाँ उसका कोई क्रमांक नहीं दिया गया, क्योंकि विभिन्न संस्करणों व टीकाओं में नामों का क्रमांक अलग-अलग बताया जाता है।
परंपरा में इस मंत्र का जप 108 बार — अर्थात एक माला — करने का विधान कहा जाता है, और इसके लिए तुलसी माला का प्रयोग बताया जाता है। जप का सुझाया गया समय प्रातः व संध्या है। संख्या से अधिक महत्व नियमितता तथा शुद्ध उच्चारण का माना गया है — प्रतिदिन एक माला, बीच-बीच में छोड़कर की गई अधिक संख्या से श्रेष्ठ कही जाती है।
परंपरा में इसके लिए बुधवार व एकादशी विशेष कहे जाते हैं। दैनिक जप का सुझाया गया समय प्रातः व संध्या है। इसके अतिरिक्त परंपरा में ये अवसर बताए जाते हैं — प्रातः-संध्या नित्य वंदन में; बुधवार व एकादशी को; किसी प्रलोभन या दुविधा से जूझते समय; जन्माष्टमी पर। सामान्य नियम यह कहा जाता है कि समय जो भी चुनें, वह प्रतिदिन एक ही रहे — इससे जप में स्थिरता आती है।
यह नाम-मंत्र है, अर्थात इष्ट के नाम का जप। परंपरा में नाम-जप के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं मानी जाती — इसे स्त्री-पुरुष, किसी भी आयु व किसी भी वर्ग का व्यक्ति श्रद्धापूर्वक जप सकता है। यही नाम-मार्ग की विशेषता कही जाती है कि इसमें पात्रता की शर्त भाव है, विधि नहीं।
पर्व
