समय
30 सेकंड
जप संख्या
108
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
बुधवार, एकादशी व नरक चतुर्दशी
उद्देश्य:रक्षा (Protection)विजय (Victory)संकट मोचन (Relief from Crisis)
✓ संपूर्ण नाम जाप
ॐ मुरारये नमः श्री कृष्ण अष्टोत्तर शतनामावली का नाम 70 है, जिसका अर्थ है “मुर असुर के शत्रु को नमस्कार”। “मुर” का प्रतीकार्थ बंधन भी लिया जाता है। नरक चतुर्दशी इसी विजय का पर्व है। शुद्ध रूप “मुरारये” है, “मुरारिये” नहीं।
FAQ
ॐ मुरारये नमः — सामान्य प्रश्न
मुरारि अर्थात् "मुर का शत्रु"। परंपरा के अनुसार मुर एक असुर था जो नरकासुर का सहयोगी था और जिसका वध कृष्ण ने किया। "मुर" का प्रतीकात्मक अर्थ बंधन या पाश भी लिया जाता है, तब मुरारि अर्थात् बंधनों का नाश करने वाले।
शुद्ध रूप "ॐ मुरारये नमः" है। "मुरारि" इकारान्त शब्द है, इसलिए उसका चतुर्थी विभक्ति रूप "मुरारये" बनता है। अष्टोत्तर शतनामावली में भी यही रूप (क्रम 70) मिलता है।
परंपरा के अनुसार कृष्ण ने पहले मुर का और फिर नरकासुर का वध कर सोलह हजार बंदी कन्याओं को मुक्त कराया। इसी विजय के स्मरण में नरक चतुर्दशी (छोटी दीपावली) मनाई जाती है, इसलिए उस दिन इस नाम का जप विशेष माना जाता है।
यह कृष्ण के वीर व रक्षक स्वरूप का नाम है, माधुर्य-भाव का नहीं। परंपरा में इसे शत्रु-बाधा, संकट और बंधन से मुक्ति की कामना से जोड़ा जाता है, इसलिए जप में स्वर दृढ़ व निर्भय रखा जाता है।
परंपरा में इस मंत्र का जप 108 बार — अर्थात एक माला — करने का विधान कहा जाता है, और इसके लिए तुलसी माला का प्रयोग बताया जाता है। जप का सुझाया गया समय प्रातः व संध्या है। संख्या से अधिक महत्व नियमितता तथा शुद्ध उच्चारण का माना गया है — प्रतिदिन एक माला, बीच-बीच में छोड़कर की गई अधिक संख्या से श्रेष्ठ कही जाती है।
परंपरा में इसके लिए बुधवार, एकादशी व नरक चतुर्दशी विशेष कहे जाते हैं। दैनिक जप का सुझाया गया समय प्रातः व संध्या है। इसके अतिरिक्त परंपरा में ये अवसर बताए जाते हैं — नरक चतुर्दशी (छोटी दीपावली) पर; बुधवार व एकादशी को; जन्माष्टमी पर; शत्रु-बाधा या संकट के समय। सामान्य नियम यह कहा जाता है कि समय जो भी चुनें, वह प्रतिदिन एक ही रहे — इससे जप में स्थिरता आती है।
यह नाम-मंत्र है, अर्थात इष्ट के नाम का जप। परंपरा में नाम-जप के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं मानी जाती — इसे स्त्री-पुरुष, किसी भी आयु व किसी भी वर्ग का व्यक्ति श्रद्धापूर्वक जप सकता है। यही नाम-मार्ग की विशेषता कही जाती है कि इसमें पात्रता की शर्त भाव है, विधि नहीं।
पर्व
