समय
30 सेकंड
जप संख्या
108
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
बुधवार, जन्माष्टमी व नन्दोत्सव
उद्देश्य:भक्ति व प्रेम (Love)वात्सल्य व संतान (Family)मन की शांति (Peace)
✓ संपूर्ण नाम जाप
ॐ नन्दनन्दनाय नमः का अर्थ है “नन्द बाबा के पुत्र को नमस्कार”। ठीक यह शब्द-रूप शतनामावली में नहीं मिलता; वहाँ सम-अर्थी नाम “नन्दगोपप्रियात्मजाय” (क्रम 14) है। यह व्रज-भक्ति परंपरा का प्रचलित संबोधन है और नन्दोत्सव पर विशेष रूप से जपा जाता है।
FAQ
ॐ नन्दनन्दनाय नमः — सामान्य प्रश्न
नन्दनन्दन अर्थात् "नन्द के पुत्र"। "नन्दन" का अर्थ पुत्र भी है और आनंद देने वाला भी, इसलिए इस नाम में सुंदर श्लेष बनता है — नन्द के पुत्र, और आनंद देने वाले।
ठीक इस शब्द-रूप में नहीं। श्री कृष्ण अष्टोत्तर शतनामावली में सम-अर्थी नाम "ॐ नन्दगोपप्रियात्मजाय नमः" (क्रम 14) मिलता है, अर्थात् नन्द गोप के प्रिय पुत्र। "नन्दनन्दन" व्रज की जीवित भक्ति-परंपरा का अत्यंत प्रचलित संबोधन है।
जन्म के तुरंत बाद वसुदेव कृष्ण को यमुना पार कर गोकुल ले गए और नन्द बाबा के घर छोड़ आए। वहीं नन्द और यशोदा ने उनका लालन-पालन किया। इसीलिए वे देवकी-वसुदेव के साथ-साथ नन्द-यशोदा के पुत्र भी कहलाते हैं।
जन्माष्टमी के अगले दिन मनाया जाने वाला पर्व, जिसमें गोकुल में कृष्ण के प्राकट्य का उत्सव मनाया जाता है। यह नाम-मंत्र उसी संबंध का है, इसलिए उस दिन इसका जप विशेष माना जाता है।
परंपरा में इस मंत्र का जप 108 बार — अर्थात एक माला — करने का विधान कहा जाता है, और इसके लिए तुलसी माला का प्रयोग बताया जाता है। जप का सुझाया गया समय प्रातः व संध्या है। संख्या से अधिक महत्व नियमितता तथा शुद्ध उच्चारण का माना गया है — प्रतिदिन एक माला, बीच-बीच में छोड़कर की गई अधिक संख्या से श्रेष्ठ कही जाती है।
परंपरा में इसके लिए बुधवार, जन्माष्टमी व नन्दोत्सव विशेष कहे जाते हैं। दैनिक जप का सुझाया गया समय प्रातः व संध्या है। इसके अतिरिक्त परंपरा में ये अवसर बताए जाते हैं — जन्माष्टमी व नन्दोत्सव पर; बुधवार व एकादशी को; प्रातः-संध्या नित्य पूजा में; संतान-कल्याण के संकल्प के साथ। सामान्य नियम यह कहा जाता है कि समय जो भी चुनें, वह प्रतिदिन एक ही रहे — इससे जप में स्थिरता आती है।
यह नाम-मंत्र है, अर्थात इष्ट के नाम का जप। परंपरा में नाम-जप के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं मानी जाती — इसे स्त्री-पुरुष, किसी भी आयु व किसी भी वर्ग का व्यक्ति श्रद्धापूर्वक जप सकता है। यही नाम-मार्ग की विशेषता कही जाती है कि इसमें पात्रता की शर्त भाव है, विधि नहीं।
पर्व
