समय
30 सेकंड
जप संख्या
108
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
बुधवार, एकादशी व गीता जयंती
उद्देश्य:मार्गदर्शन व निर्णय (Guidance)विजय (Victory)आध्यात्मिक उन्नति (Spiritual Growth)
✓ संपूर्ण नाम जाप
ॐ पार्थसारथये नमः श्री कृष्ण अष्टोत्तर शतनामावली का नाम 92 है, जिसका अर्थ है “अर्जुन के सारथि को नमस्कार”। इसी भूमिका में उन्होंने कुरुक्षेत्र पर भगवद्गीता का उपदेश दिया। शुद्ध रूप “सारथये” है, “सारथाय” नहीं; चेन्नई का पार्थसारथी मंदिर इसकी प्रसिद्ध पीठ है।
FAQ
ॐ पार्थसारथये नमः — सामान्य प्रश्न
पार्थसारथि अर्थात् "पार्थ (अर्जुन) के सारथि"। "पार्थ" का अर्थ है पृथा यानी कुन्ती का पुत्र। महाभारत युद्ध में कृष्ण ने शस्त्र न उठाने का व्रत लिया था, इसलिए वे अर्जुन के रथ के सारथि बने। यह नाम अष्टोत्तर शतनामावली में क्रम 92 पर आता है।
सारथि की इसी भूमिका में कृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान पर, दोनों सेनाओं के बीच रथ खड़ा कर अर्जुन को भगवद्गीता का उपदेश दिया। इसीलिए यह नाम गीता से अभिन्न माना जाता है और गीता जयंती पर विशेष स्मरण किया जाता है।
शुद्ध रूप "ॐ पार्थसारथये नमः" है। "सारथि" इकारान्त शब्द है, इसलिए उसका चतुर्थी विभक्ति रूप "सारथये" बनता है, "सारथाय" नहीं।
चेन्नई (तमिलनाडु) का श्री पार्थसारथी मंदिर, जो 108 दिव्य देशों में से एक है, इस स्वरूप की प्रसिद्ध उपासना-पीठ है। वहाँ भगवान सारथि रूप में ही विराजमान हैं।
परंपरा में इस मंत्र का जप 108 बार — अर्थात एक माला — करने का विधान कहा जाता है, और इसके लिए तुलसी माला का प्रयोग बताया जाता है। जप का सुझाया गया समय प्रातः, गीता-पाठ से पूर्व है। संख्या से अधिक महत्व नियमितता तथा शुद्ध उच्चारण का माना गया है — प्रतिदिन एक माला, बीच-बीच में छोड़कर की गई अधिक संख्या से श्रेष्ठ कही जाती है।
परंपरा में इसके लिए बुधवार, एकादशी व गीता जयंती विशेष कहे जाते हैं। दैनिक जप का सुझाया गया समय प्रातः, गीता-पाठ से पूर्व है। इसके अतिरिक्त परंपरा में ये अवसर बताए जाते हैं — गीता जयंती (मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी) पर; भगवद्गीता का पाठ आरंभ करने से पूर्व; बुधवार व एकादशी को; किसी कठिन निर्णय या दुविधा के समय। सामान्य नियम यह कहा जाता है कि समय जो भी चुनें, वह प्रतिदिन एक ही रहे — इससे जप में स्थिरता आती है।
यह नाम-मंत्र है, अर्थात इष्ट के नाम का जप। परंपरा में नाम-जप के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं मानी जाती — इसे स्त्री-पुरुष, किसी भी आयु व किसी भी वर्ग का व्यक्ति श्रद्धापूर्वक जप सकता है। यही नाम-मार्ग की विशेषता कही जाती है कि इसमें पात्रता की शर्त भाव है, विधि नहीं।
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