समय
30 सेकंड
जप संख्या
108
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
बुधवार व एकादशी
उद्देश्य:आध्यात्मिक उन्नति (Spiritual Growth)मोक्ष (Liberation)मन की शांति (Peace)
✓ संपूर्ण नाम जाप
ॐ वासुदेवाय नमः श्री कृष्ण अष्टोत्तर शतनामावली का नाम 3 है। इसके दो अर्थ हैं — वसुदेव के पुत्र, तथा जो समस्त प्राणियों में निवास करते हैं। भागवत परंपरा में दूसरा अर्थ प्रधान है। ध्यान दें: “वासुदेव” पुत्र हैं, “वसुदेव” पिता — एक दीर्घ मात्रा का अंतर है।
FAQ
ॐ वासुदेवाय नमः — सामान्य प्रश्न
दो अर्थ साथ चलते हैं। सीधा अर्थ है वसुदेव के पुत्र। गूढ़ अर्थ में "वसु" का अर्थ निवास करना है, इसलिए वासुदेव वे हैं जो समस्त प्राणियों में निवास करते हैं और जिनमें सृष्टि निवास करती है। भागवत परंपरा में दूसरा अर्थ प्रधान माना जाता है।
"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" द्वादशाक्षरी (बारह अक्षरों का) मंत्र है और भागवत परंपरा का प्रधान मंत्र माना जाता है; इस संग्रह में उसका अपना पृष्ठ पहले से है। "ॐ वासुदेवाय नमः" उसी नाम का संक्षिप्त नाम-मंत्र है, जो नामावलियों में आता है।
केवल एक दीर्घ मात्रा का, पर अर्थ पूरा बदल जाता है। "वसुदेव" कृष्ण के पिता का नाम है, जबकि "वासुदेव" स्वयं कृष्ण का — अर्थात् वसुदेव के पुत्र। उच्चारण में आरंभ का "वा" दीर्घ रखना आवश्यक है।
पाञ्चरात्र आगम में वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध — ये चार व्यूह माने जाते हैं, जिनमें वासुदेव परम व मूल हैं। श्री कृष्ण चतुर्विंशति नामावली में भी ये चारों नाम क्रम से आते हैं।
परंपरा में इस मंत्र का जप 108 बार — अर्थात एक माला — करने का विधान कहा जाता है, और इसके लिए तुलसी माला का प्रयोग बताया जाता है। जप का सुझाया गया समय ब्रह्म मुहूर्त व संध्या है। संख्या से अधिक महत्व नियमितता तथा शुद्ध उच्चारण का माना गया है — प्रतिदिन एक माला, बीच-बीच में छोड़कर की गई अधिक संख्या से श्रेष्ठ कही जाती है।
परंपरा में इसके लिए बुधवार व एकादशी विशेष कहे जाते हैं। दैनिक जप का सुझाया गया समय ब्रह्म मुहूर्त व संध्या है। इसके अतिरिक्त परंपरा में ये अवसर बताए जाते हैं — बुधवार व एकादशी को; प्रातः व संध्या नित्य पूजा में; जन्माष्टमी पर; ध्यान व साधना के आरंभ में। सामान्य नियम यह कहा जाता है कि समय जो भी चुनें, वह प्रतिदिन एक ही रहे — इससे जप में स्थिरता आती है।
यह नाम-मंत्र है, अर्थात इष्ट के नाम का जप। परंपरा में नाम-जप के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं मानी जाती — इसे स्त्री-पुरुष, किसी भी आयु व किसी भी वर्ग का व्यक्ति श्रद्धापूर्वक जप सकता है। यही नाम-मार्ग की विशेषता कही जाती है कि इसमें पात्रता की शर्त भाव है, विधि नहीं।
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