समय
8–10 मिनट
कुल नाम
108
कठिनाई
सरल (Beginner)
शुभ दिन
शुक्रवार; दीपावली व शरद पूर्णिमा
उद्देश्य:समृद्धि (Prosperity)धन-प्राप्ति (Wealth)सौभाग्य (Good Fortune)
✓ संपूर्ण
श्री लक्ष्मी अष्टोत्तर शतनामावली माँ लक्ष्मी के 108 नामों की सूची है, जो प्रकृति से आरंभ होकर भुवनेश्वरी पर समाप्त होती है। हर नाम "ॐ … नमः" रूप में पढ़ा जाता है, इसलिए यह अर्चना तथा माला-जप दोनों के लिए उपयुक्त है। पाठ में 8–10 मिनट लगते हैं।
FAQ
श्री लक्ष्मी अष्टोत्तर शतनामावली — सामान्य प्रश्न
पहला नाम ॐ प्रकृत्यै नमः है — मूल प्रकृति-स्वरूपा। और 108वाँ अर्थात अंतिम नाम ॐ भुवनेश्वर्यै नमः है — समस्त भुवनों की ईश्वरी। यह क्रम स्वयं एक कथन है: सूची सांख्य की "प्रकृति" से आरंभ होकर शाक्त परंपरा की "भुवनेश्वरी" पर समाप्त होती है — बीच में धन-ऐश्वर्य के नाम आते ज़रूर हैं, पर दोनों छोर दार्शनिक हैं।
यह इस नामावली की सबसे सूक्ष्म बात है। नाम 1 प्रकृति है (सृष्टि का मूल तत्त्व) और नाम 2 विकृति (उसी का विकार-रूप में प्रकट होना) — यह सीधे सांख्य दर्शन की शब्दावली है। यानी सूची आरंभ में ही यह कह देती है कि लक्ष्मी धन की देवी भर नहीं, सृष्टि का मूल तत्त्व हैं। इसी क्रम में आगे श्रद्धा, विभूति, सुरभि, परमात्मिका, वाच्, बुद्धि, तुष्टि व पुष्टि आते हैं — सब वैदिक-दार्शनिक नाम, ऐश्वर्य के नहीं।
नाम 41 से 52 तक लगातार बारह नाम कमल से बनते हैं — पद्मप्रिया, पद्महस्ता, पद्माक्षी, पद्मसुन्दरी, पद्मोद्भवा, पद्ममुखी, पद्मनाभप्रिया, पद्ममालाधरा, पद्मिनी, पद्मगन्धिनी। एक ही प्रतीक को इतने कोणों से खोलना — क्या प्रिय है, हाथ में क्या है, नेत्र कैसे हैं, उत्पत्ति कहाँ से, गंध कैसी — इस नामावली की अपनी शैली है। इनके अतिरिक्त नाम 10 पद्मालया तथा 11 पद्मा पहले ही आ चुके होते हैं।
नहीं — यह सामान्य भ्रम है। अष्टलक्ष्मी अर्थात आदि, धान्य, धैर्य, गज, सन्तान, विजय, विद्या व धन लक्ष्मी — उनकी अपनी अलग नामावली है। यह अष्टोत्तर शतनामावली माँ लक्ष्मी के 108 नामों की एक स्वतंत्र सूची है, जो "प्रकृति" से आरंभ होकर "भुवनेश्वरी" पर समाप्त होती है।
क्योंकि स्तोत्र-रूप की फलश्रुति स्वयं यह कहती है — "भृगुवारे शतं धीमान् पठेद्वत्सरमात्रकम्", अर्थात बुद्धिमान व्यक्ति भृगुवार (शुक्रवार) को एक वर्ष तक सौ बार इसका पाठ करे। वही फलश्रुति इसे "दारिद्र्यमोचन" स्तोत्र कहती है और प्रातःकाल पाठ का विधान बताती है। यह परंपरा किसी बाहरी नियम से नहीं, स्तोत्र के अपने पाठ से आती है।
यह इस नामावली का सबसे अप्रत्याशित मोड़ है। सूची विष्णुपत्नी (98) और नारायणसमाश्रिता (100) कहती हुई चलती है, फिर अंतिम पाँच नामों में शाक्त हो जाती है — नवदुर्गा (104), महाकाली (105), ब्रह्माविष्णुशिवात्मिका (106), त्रिकालज्ञानसम्पन्ना (107) और भुवनेश्वरी (108)। भाव यह है कि लक्ष्मी विष्णु की शक्ति भर नहीं, स्वयं आदिशक्ति हैं। वैष्णव और शाक्त — दोनों दृष्टियाँ एक ही सूची में साथ रखी गई हैं।
यहाँ स्रोत सचमुच बँटे हुए हैं, इसलिए इसे छिपाया नहीं गया। नामावली-रूप में नाम 28 कामाक्ष्यै तथा 29 क्षीरोदसम्भवायै मिलते हैं। स्तोत्र-रूप का मुख्य पाठ वहाँ "क्षमां क्षीरोदसम्भवाम्" पढ़ता है और उसी के नीचे पाठान्तर दर्ज है — "कामाक्षीं क्रोधसम्भवाम्"। अर्थात एक परंपरा "क्षमा" पढ़ती है, दूसरी "कामाक्षी"। यहाँ आधार-पाठ (कामाक्षी) रखा गया है और भेद यहाँ दर्ज है — निर्णय पाठक पर छोड़ा गया।
यह निश्चित नहीं है, और इसे स्पष्ट कह देना चाहिए। स्तोत्र-रूप की फलश्रुति इसे "दारिद्र्यमोचन" स्तोत्र कहती है और यह भी कहती है कि "देवी के सहस्र नामों में से यह पुण्यमय अष्टोत्तर शत है" — किंतु किसी उपलब्ध स्रोत ने पुराण अथवा अध्याय-क्रमांक नहीं दिया, और कई बड़े संग्रह कोई स्रोत बताते ही नहीं। इसलिए यहाँ कोई ग्रंथ-नाम नहीं गढ़ा गया।
परंपरागत विधि अर्चना है — प्रत्येक नाम "ॐ … नमः" के साथ पढ़ते हुए एक कमल-पुष्प, गुलाब अथवा अक्षत अर्पित करते जाना। यदि यह संभव न हो तो कमलगट्टे की माला लेकर जप करें; 108 नाम पूरे होने पर ठीक एक माला पूर्ण होती है। आरंभ में "ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः" तीन बार कहने की परंपरा है। फलश्रुति के अनुसार पाठ प्रातःकाल करना चाहिए और पाठ करते समय देवी का सर्वाभरण-भूषित रूप ध्यान में रखना चाहिए। पूरा पाठ 8–10 मिनट में पूर्ण होता है।
पर्व
