समय
8–10 मिनट
कुल नाम
108
कठिनाई
सरल (Beginner)
शुभ दिन
गुरुवार; एकादशी
उद्देश्य:रक्षा (Protection)समृद्धि (Prosperity)मोक्ष (Liberation)
✓ संपूर्ण
श्री विष्णु अष्टोत्तर शतनामावली भगवान विष्णु के 108 नामों की सूची है, जो विष्णु से आरंभ होकर प्रह्लादपरिपालक पर समाप्त होती है। हर नाम "ॐ … नमः" रूप में पढ़ा जाता है, इसलिए यह अर्चना तथा माला-जप दोनों के लिए उपयुक्त है। पाठ में 8–10 मिनट लगते हैं।
FAQ
श्री विष्णु अष्टोत्तर शतनामावली — सामान्य प्रश्न
नहीं, और यह जान लेना ज़रूरी है। इस शीर्षक से कई अलग सूचियाँ प्रचलित हैं और उनके नाम आपस में मिलते नहीं। अकेले एक ही बड़े संग्रह पर चार अलग पृष्ठ हैं — (1) यह वाली, विष्णु से आरंभ; (2) पद्मपुराण वर्णित एक भिन्न सूची; (3) "नमाम्यहं हृषीकेशम्" से आरंभ होने वाली; (4) विष्णु के 100 नामों की एक अलग सूची। इनके अतिरिक्त एक पूर्णतः भिन्न स्तोत्र-रूप भी है जो "विष्णुर्जिष्णुर्वषट्कारो देवदेवो वृषाकपिः" से आरंभ होता है। यहाँ सर्वाधिक प्रचलित सूची दी गई है।
पहला नाम ॐ विष्णवे नमः है — सर्वत्र व्याप्त। और 108वाँ अर्थात अंतिम नाम ॐ प्रह्लादपरिपालकाय नमः है — प्रह्लाद का पालन करने वाले। यह क्रम स्वयं एक कथन है: सूची परब्रह्म व सृष्टि-तत्त्व से आरंभ होकर अंत में एक भक्त के नाम पर आकर ठहरती है, किसी बड़े दार्शनिक पद पर नहीं।
केवल दश अवतार नहीं — कहीं अधिक। नाम 45 से 60 तक लगभग बिना रुके आते हैं: मत्स्य, कूर्म, क्रोड (वराह), नृकेसरी (नरसिंह), वामन, भार्गव (परशुराम), राम, बलि (बलराम), कल्कि, हयानन (हयग्रीव), शिशुमार, कपिल, ध्रुव, दत्तात्रेय। इनके अतिरिक्त हंस (28), मोहिनीरूपधारी (73), ऋषभ (72), नर (80) तथा बुद्धावतार (100) भी हैं — यानी यह श्रीमद्भागवत की चौबीस-अवतार परंपरा को समेटती है, केवल दशावतार को नहीं।
ये चारों पांचरात्र आगम के चतुर्व्यूह हैं — विष्णु के चार व्यूह-स्वरूप। सूची उन्हें जानबूझकर बिखेरकर रखती है: वासुदेव (8), प्रद्युम्न (67), सङ्कर्षण (74) तथा अनिरुद्ध (78)। इसीलिए साधारण पाठक को पता ही नहीं चलता कि वह एक पूरा दार्शनिक ढाँचा पढ़ रहा है। यह इस सूची की उन बातों में है जो प्रायः कहीं नहीं समझाई जातीं।
नाम 88 शङ्करप्रिय है, अर्थात शंकर को प्रिय। एक वैष्णव सूची में शिव का यह उल्लेख उसी हरि-हर अभेद परंपरा का संकेत है जो शिव अष्टोत्तर शतनामावली में उलटी दिशा से मिलती है — वहाँ नाम 13 विष्णुवल्लभ है और नाम 96 हरि। दोनों सूचियाँ एक-दूसरे की ओर हाथ बढ़ाती हैं; यह संयोग नहीं है।
दाम + उदर, अर्थात जिनके उदर पर रस्सी का बंधन पड़ा। यह श्रीकृष्ण-लीला का वह प्रसंग है जिसमें माता यशोदा ने उन्हें ऊखल से बाँधा था। ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह नाम सूची के अंत के पास, विराड्रूप (104) तथा भूतभव्यभवत्प्रभु (105) जैसे विराट नामों के ठीक पहले रखा गया है — बंधन और विराटता आमने-सामने।
नहीं, 108 ही हैं। कुछ स्थानों पर 108 नामों के बाद क्रमांक 109 पर "ॐ श्रीमहाविष्णवे नमः" छपा मिलता है — वह सूची का 109वाँ नाम नहीं, बल्कि पाठ के अंत का समापन-नमस्कार है। पाठ-विधि में उसे कहने की परंपरा है, पर गणना 108 पर ही समाप्त होती है।
हाँ, पर अधिकांश केवल अनुस्वार व संयुक्ताक्षर के मुद्रण-भेद हैं (पीतांबर/पीताम्बर, विश्वंभर/विश्वम्भर) जो अर्थ नहीं बदलते। दो स्थान वास्तविक हैं: नाम 60 कहीं "दत्तत्रेयाय" छपता है, जो दत्तात्रेयाय का मुद्रण-दोष है और यहाँ सुधारा गया; और नाम 75 कहीं "प्रभवे" तो कहीं "पृथवे" (पृथु-अवतार) मिलता है — निर्णायक प्रमाण न मिलने से आधार-पाठ "प्रभवे" रखा गया और भेद दर्ज है। एक स्रोत में नाम 85 "सूर्यमण्डलमध्यगाय" छूटा हुआ भी मिला।
पैमाने का, और स्रोत का। विष्णु सहस्रनाम महाभारत के अनुशासन पर्व की रचना है, उसमें एक हज़ार से अधिक नाम हैं और पाठ 30–40 मिनट का होता है; उसका मूल संदर्भ स्पष्ट है। यह अष्टोत्तर शतनामावली 108 नामों की छोटी सूची है, 8–10 मिनट की, और इसका मूल ग्रंथ अनिश्चित है। दोनों में कुछ नाम साझा होना स्वाभाविक है, पर एक दूसरे का संक्षेप नहीं है।
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