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FAQ
राम नवमी व्रत कथा — सामान्य प्रश्न
क्योंकि परंपरा के अनुसार श्रीराम का प्राकट्य मध्याह्न काल में हुआ था — चैत्र शुक्ल नवमी को, पुनर्वसु नक्षत्र में, ठीक दोपहर। अधिकांश तिथि-व्रतों में सूर्योदय के समय की तिथि ली जाती है, किंतु यहाँ मध्याह्नव्यापिनी नवमी ग्राह्य है — अर्थात जिस दिन मध्याह्न के समय नवमी हो, वही दिन। यही स्थिति गणेश चतुर्थी की भी है, जहाँ प्राकट्य मध्याह्न में माना जाता है।
अयोध्या के राजा दशरथ के तीन रानियाँ थीं पर कोई संतान नहीं। गुरुजनों के परामर्श से उन्होंने पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराया। यज्ञ पूर्ण होने पर अग्नि-कुंड से एक दिव्य पुरुष प्रकट हुआ और खीर से भरा पात्र दिया। दशरथ ने वह खीर तीनों रानियों में बाँटी, जिससे चार पुत्र हुए — कौसल्या से राम, कैकेयी से भरत, तथा सुमित्रा से लक्ष्मण व शत्रुघ्न। छह ऋतुएँ बीतने पर, यज्ञ के ठीक एक वर्ष बाद, चैत्र शुक्ल नवमी को मध्याह्न में माता कौसल्या ने श्रीराम को जन्म दिया।
क्योंकि उन्हें खीर का भाग दो बार मिला। और यहीं कथा की सबसे सुंदर बात है: परंपरा इसी से यह भी जोड़ती है कि लक्ष्मण आजीवन राम के साथ रहे और शत्रुघ्न भरत के साथ — जो भाग जिस रानी के अंश से मिला, वह पुत्र उसी भाई से जुड़ गया। यानी आगे की पूरी रामायण की धुरी — चार भाइयों का यह जोड़ा-बँटवारा — उसी एक क्षण में तय हो गया था।
स्रोत यहाँ एकमत नहीं हैं, इसलिए दोनों नाम दर्ज हैं। प्रचलित आख्यान में यह यज्ञ ऋष्यशृंग (शृंगी ऋषि) ने सम्पन्न कराया और महर्षि वसिष्ठ का मार्गदर्शन रहा; कुछ स्रोत सीधे वसिष्ठ जी को ही यज्ञ का कर्ता बताते हैं। यहाँ किसी एक को अंतिम नहीं कहा गया।
चैत्र शुक्ल नवमी, पुनर्वसु नक्षत्र, मध्याह्न काल — यही तीन बातें आधार-स्रोतों में स्पष्ट मिलती हैं, और कथा समय का हिसाब भी देती है: *"छह ऋतुएँ बीतने पर बारहवें मास"*, अर्थात यज्ञ के ठीक एक वर्ष बाद। लग्न (कर्क) का उल्लेख अनेक लोकप्रिय स्रोतों में मिलता है, किंतु आधार-स्रोत उसे नहीं देता — इसलिए यहाँ वह नहीं जोड़ा गया।
दिनभर निराहार अथवा फलाहार, सामर्थ्यानुसार। फल, दूध, दही, साबूदाना, राजगिरा या कुट्टू का आटा, मेवा, आलू, शकरकंद तथा नारियल-पानी ग्राह्य हैं। अन्न — गेहूँ, चावल आदि — तथा साधारण नमक वर्जित हैं; सेंधा नमक की छूट है। प्याज-लहसुन व तामसिक भोजन पूर्णतः वर्जित। पारण मध्याह्न पूजन के पश्चात होता है।
हाँ — राम नवमी चैत्र नवरात्रि का अंतिम, नौवाँ दिन है। इसीलिए नवरात्रि का व्रत रखने वाले प्रायः इसी दिन पारण करते हैं और एक ही दिन दो व्रत पूर्ण होते हैं। यह संयोग परंपरा में अर्थपूर्ण माना जाता है — नौ दिन शक्ति की आराधना के बाद मर्यादा पुरुषोत्तम का प्राकट्य।
क्योंकि श्रीराम विष्णु के अवतार माने जाते हैं, और वैष्णव परंपरा में तुलसी के बिना भोग अपूर्ण माना जाता है। इस दिन भोग में खीर का विशेष स्थान है — वही खीर जो कथा का केंद्र है — तथा केसर-भात, पंजीरी व मिष्ठान्न भी अर्पित किए जाते हैं।
सबसे प्रमुख है रामचरितमानस के बालकाण्ड का राम-जन्म प्रसंग, जो इसी दिन की कथा है। इसके साथ रामरक्षा स्तोत्र तथा राम चालीसा का पाठ होता है; सामर्थ्य हो तो सुंदरकाण्ड भी। दिनभर "श्री राम जय राम जय जय राम" का जप चलता है, और मध्याह्न में झूला सजाकर शंख-ध्वनि व कीर्तन के साथ राम-जन्मोत्सव मनाया जाता है।
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