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FAQ
बसंत पंचमी व्रत कथा — सामान्य प्रश्न
माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को। पूजन सूर्योदय के पश्चात तथा मध्याह्न से पूर्व करने का विधान है — यही इस पर्व का ग्राह्य काल माना जाता है। यह वही दिन है जब ऋतु बदलती है: शिशिर जाता है और बसंत आता है।
ब्रह्मा जी सृष्टि रचकर धरती पर विचरण करने निकले तो देखा कि सब कुछ है, पर सब नीरस और मौन है। उन्होंने कमंडल से जल छिड़का और चार भुजाओं वाली देवी प्रकट हुईं — हाथों में वीणा, माला, पुस्तक तथा वर मुद्रा। ब्रह्मा जी ने उन्हें सरस्वती कहा और वीणा बजाने को कहा। तार झंकृत होते ही प्राणी बोलने लगे, नदियाँ बहने लगीं, हवा में संगीत आ गया। एक दूसरी कथा में श्रीकृष्ण देवी को वरदान देते हैं कि माघ शुक्ल पंचमी को समस्त विश्व उनकी पूजा करेगा।
कमी वस्तुओं की नहीं, आवाज़ की थी। कथा में सृष्टि पहले से पूरी है — मनुष्य, जीव-जंतु, नदियाँ, पर्वत सब हैं। जो नहीं है वह ध्वनि है। और जब वीणा बजती है, तब प्राणी बोलने लगते हैं, नदियाँ कलकल करने लगती हैं और हवा संगीत बन जाती है। इसीलिए सरस्वती केवल विद्या की नहीं, वाणी, संगीत व अभिव्यक्ति की भी देवी हैं — और यह पर्व केवल पढ़ाई का नहीं, बोलने और गाने का भी है।
पीला इस पर्व का रंग है — पीत वस्त्र, पीत पुष्प, पीली रोली, पीला गुलाल तथा भोग में बेसन के लड्डू व पीली मिठाई। यह संयोग नहीं: माघ के अंत में सरसों के खेत पीले हो जाते हैं, और यह पर्व उसी ऋतु-परिवर्तन का उत्सव है। परंपरा में श्वेत वस्त्र भी स्वीकार्य हैं, क्योंकि सरस्वती का अपना वर्ण श्वेत माना जाता है।
नहीं — और यह जान लेना चाहिए। एक मान्यता में वे ब्रह्मा के मुख से प्रकट हुईं; पश्चिमी भारत में उन्हें सूर्य की पुत्री माना जाता है; पूर्वी भारत में पार्वती की पुत्री; कहीं उनका विवाह कार्तिकेय से बताया जाता है; और कहीं उन्हें विष्णु की तीन पत्नियों — सरस्वती, गंगा व लक्ष्मी — में गिना जाता है। ये अलग-अलग क्षेत्रों की जीवित परंपराएँ हैं; यहाँ किसी एक को "सही" कहकर बाक़ी छोड़ी नहीं गईं। यही बहुलता सरस्वती अष्टोत्तर शतनामावली में भी है, जहाँ शिवानुजा (नाम 9) और ब्रह्मजाया (नाम 69) एक ही सूची में हैं।
यह इस पर्व की सबसे विशिष्ट परंपरा है। पूजा-स्थान पर पुस्तक, कलम अथवा वाद्य-यंत्र रखकर उनका भी पूजन किया जाता है — अर्थात जो विद्या या कला साधक की है, वही अर्पित होती है। विद्यार्थी अपनी पुस्तकें रखते हैं, संगीतज्ञ अपने वाद्य। इसी दिन बालकों का अक्षर-लेखन आरंभ कराने की परंपरा है, जिसे विद्यारंभ-संस्कार कहते हैं।
पूजन के अंत में हवन कुंड बनाकर "ॐ श्री सरस्वत्यै नमः स्वाहा" मंत्र से एक माला की आहुति देने का विधान है। हवन के पश्चात खड़े होकर आरती की जाती है, और परंपरा में आरती के दीपक को घर अथवा विद्यालय में चारों ओर घुमाया जाता है, ताकि नकारात्मक प्रभाव दूर हों। जप का मुख्य मंत्र "ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः" है।
सबसे प्रमुख सरस्वती वंदना है। इसके साथ सरस्वती स्तोत्र (अगस्त्य-कृत, जिसका पहला श्लोक "या कुन्देन्दुतुषारहारधवला" विद्यालयों में प्रतिदिन गाया जाता है), सरस्वती अष्टकम् तथा सरस्वती चालीसा पढ़े जाते हैं; सामर्थ्य हो तो सरस्वती अष्टोत्तर शतनामावली की अर्चना भी। परंपरा में सरस्वती कवच का पाठ भी शुभ माना जाता है।
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