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FAQ
मंगलवार व्रत कथा — सामान्य प्रश्न
परंपरा में इसे इक्कीस मंगलवार तक लगातार रखने का विधान है, और बाईसवें मंगलवार को उद्यापन किया जाता है। संकल्प लेते समय यह संख्या स्पष्ट कह देनी चाहिए। मान्यता है कि बीच में कोई मंगलवार छूट जाए तो गिनती फिर से आरंभ की जाती है — इसीलिए इसे विधि में सरल पर संकल्प में कठिन व्रत कहा जाता है।
इस व्रत का मुख्य आहार-नियम है — दिन में केवल एक बार भोजन, वह भी सूर्यास्त से पूर्व और हनुमान जी को भोग लगाने के बाद। कई क्षेत्रों में नमक त्यागने तथा मीठा भोजन लेने की परंपरा है; गेहूँ व गुड़ से बना भोजन और बूँदी के लड्डू शुभ माने जाते हैं। प्याज-लहसुन, मांस-मदिरा तथा तामसिक भोजन पूर्णतः वर्जित हैं।
एक निःसंतान ब्राह्मण दंपत्ति थे। ब्राह्मणी मंगलवार का व्रत रखती और हनुमान जी को भोग लगाकर ही भोजन करती थी। एक बार वह भोग न लगा सकी, तो प्रण किया कि अगले मंगलवार भोग लगाकर ही खाएगी — और छह दिन निराहार पड़ी रही। मंगलवार को वह बेहोश हो गई। उसकी निष्ठा से प्रसन्न होकर हनुमान जी ने उसे पुत्र दिया, जिसका नाम मंगल रखा गया। लौटने पर पति को विश्वास नहीं हुआ और उसने बालक को कुएँ में गिरा दिया, पर बालक मुस्कुराता हुआ लौट आया। रात को स्वप्न में हनुमान जी ने सत्य बताया, और उसके बाद दोनों नियम से व्रत रखने लगे।
दो बातें। पहली — फल पूजा की पूर्णता को नहीं, संकल्प की दृढ़ता को मिला। ब्राह्मणी भोग लगा ही नहीं पाई थी; वरदान उसकी ज़िद पर मिला, कर्मकांड पर नहीं। दूसरी — अविश्वास करने वाला कोई बाहरी नहीं, स्वयं पति है। व्रत-कथाओं में यह विरला है: यहाँ परीक्षा भक्त की नहीं, संशय करने वाले की होती है, और उसका समाधान भी स्वप्न-दर्शन से होता है।
दोनों का, और यही इस वार की दोहरी पहचान है। भक्ति-परंपरा में मंगलवार हनुमान जी का दिन है; ज्योतिष में यह मंगल ग्रह का वार है। जो संतान, साहस या संकट-मुक्ति की कामना से रखते हैं वे इसे हनुमान-व्रत मानते हैं; जो ज्योतिषीय परामर्श से रखते हैं वे इसे मंगल-दोष की शांति का उपाय मानते हैं। विधि दोनों में लगभग एक ही रहती है — लाल वस्त्र, सिंदूर, बूँदी के लड्डू और हनुमान चालीसा।
यह मंगलवार-पूजन का सबसे विशिष्ट अर्पण है। परंपरा में सिंदूर में चमेली का तेल मिलाकर हनुमान जी को अर्पित किया जाता है, और सामर्थ्य हो तो पूरा चोला चढ़ाया जाता है। इसके साथ लाल पुष्प — विशेषतः गेंदा — तथा बूँदी अथवा बेसन के लड्डू का भोग लगाया जाता है।
इक्कीस मंगलवार पूर्ण होने पर बाईसवें मंगलवार को उद्यापन होता है। उस दिन विधिवत पूजन कर हनुमान जी को चोला चढ़ाया जाता है, हवन किया जाता है और दान दिया जाता है — परंपरा में गेहूँ, मसूर, गुड़ तथा लाल वस्त्र का। उद्यापन-सामग्री में लाल वस्त्र, यज्ञोपवीत, पंचामृत, पान-सुपारी, पाँच प्रकार के फल, रोली, मौली, लाल चावल, घी, सिंदूर तथा तिल-गुड़ के लड्डू बताए जाते हैं।
ज्येष्ठ मास के मंगलवारों को यह नाम दिया जाता है। इसका सबसे विशेष रूप लखनऊ में दिखता है, जहाँ अलीगंज हनुमान मंदिर सहित नगर भर के मंदिरों में दर्शन के साथ बड़े भंडारे लगते हैं; यह परंपरा लगभग चार सौ वर्ष पुरानी बताई जाती है। इसके आरंभ की कथा नवाबी काल की एक बेगम, उनके स्वप्न और महामारी के शमन से जोड़ी जाती है — किंतु उस प्रसंग का विवरण स्रोत-दर-स्रोत बदलता है (कौन-सी बेगम, कौन-सा वर्ष), इसलिए यहाँ वह विवरण नहीं दिया गया।
किसी भी मंगलवार से आरंभ किया जा सकता है — इसके लिए कोई विशेष तिथि अनिवार्य नहीं है। परंपरा में शुक्ल पक्ष का मंगलवार तथा ज्येष्ठ मास के मंगलवार आरंभ के लिए विशेष शुभ माने जाते हैं। महत्व तिथि का नहीं, इस बात का है कि इक्कीस मंगलवार बिना टूटे पूरे हों।
कोई भी हनुमान-भक्त स्त्री या पुरुष। परंपरा में यह विशेष रूप से संतान-प्राप्ति, भय व संकट से मुक्ति, साहस तथा मंगल-दोष की शांति की कामना से रखा जाता है। रोगी, गर्भवती स्त्रियाँ तथा बालक सामर्थ्यानुसार फलाहार पर व्रत रख सकते हैं। व्रत-अवधि में ब्रह्मचर्य का पालन अनिवार्य नियम माना जाता है।
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