मंगलवार व्रत कथा

Mangalvar Vrat Katha (Tuesday Fast Story)

वार व्रत (मंगलवार) — इक्कीस मंगलवार का संकल्प-व्रत

✓ संपूर्ण

परिचय व महत्व

मंगलवार का दिन परंपरा में हनुमान जी तथा मंगल ग्रह — दोनों से जुड़ा है, और यही इस व्रत की दोहरी पहचान है। जो भक्ति के भाव से रखते हैं वे इसे हनुमान-व्रत मानते हैं; जो ज्योतिष के परामर्श से रखते हैं वे इसे मंगल-दोष की शांति का उपाय मानते हैं। दोनों में विधि लगभग एक ही रहती है — लाल वस्त्र, सिंदूर, बूँदी के लड्डू और हनुमान चालीसा का पाठ।

यह व्रत एक दिन का नहीं, संकल्प का है। परंपरा कहती है कि इसे इक्कीस मंगलवार तक लगातार रखा जाए और बाईसवें मंगलवार को उद्यापन किया जाए। बीच में कोई मंगलवार छूट जाए तो गिनती फिर से आरंभ करने की मान्यता है — इसी कारण इसे "सरल पर लंबा" व्रत कहा जाता है।

कथा का जो रूप सबसे अधिक प्रचलित है, वह किसी युद्ध या पराक्रम की नहीं, एक भूखी स्त्री की ज़िद की कथा है। एक ब्राह्मणी ने प्रण किया कि हनुमान जी को भोग लगाए बिना अन्न नहीं लेगी, और छह दिन निराहार पड़ी रही। यहाँ फल संकल्प की दृढ़ता को मिलता है, कर्मकांड की पूर्णता को नहीं — और कथा का पूरा वज़न इसी बिंदु पर है।

कथा का दूसरा आधा हिस्सा और भी असामान्य है, क्योंकि वहाँ अविश्वास करने वाला कोई बाहरी नहीं, स्वयं पति है। वह पत्नी की बात नहीं मानता और बालक को कुएँ में गिरा देता है — और बालक लौट आता है। यह प्रसंग व्रत-कथाओं में विरला है: यहाँ परीक्षा भक्त की नहीं, संशय करने वाले की होती है।

एक क्षेत्रीय परंपरा अलग से उल्लेखनीय है — बड़ा मंगल (कहीं-कहीं "बुढ़वा मंगल")। ज्येष्ठ मास के मंगलवारों को यह नाम दिया जाता है और लखनऊ में इसका विशेष महत्व है, जहाँ अलीगंज हनुमान मंदिर सहित नगर भर में भंडारे लगते हैं। यह परंपरा लगभग चार सौ वर्ष पुरानी बताई जाती है।

व्रत नियम (Fasting Guide)

कौन रखेकोई भी हनुमान-भक्त स्त्री-पुरुष यह व्रत रख सकते हैं। परंपरा में यह विशेष रूप से संतान-प्राप्ति, भय व संकट से मुक्ति, साहस तथा मंगल-दोष की शांति की कामना से रखा जाता है। रोगी, गर्भवती स्त्रियाँ तथा बालक सामर्थ्यानुसार फलाहार पर व्रत रख सकते हैं।
कब रखेंप्रत्येक मंगलवार को। परंपरा में इसे इक्कीस मंगलवार तक लगातार रखने का विधान है और बाईसवें मंगलवार को उद्यापन किया जाता है। आरंभ किसी भी मंगलवार से किया जा सकता है; ज्येष्ठ मास के मंगलवार (बड़ा मंगल) विशेष माने जाते हैं।
आहार नियम:
  • दिन में केवल एक बार भोजन — यही इस व्रत का मुख्य आहार-नियम है
  • भोजन सूर्यास्त से पूर्व, हनुमान जी को भोग लगाने के बाद ही ग्रहण करें
  • नमक का त्याग करने की परंपरा कई क्षेत्रों में है; मीठा भोजन प्रचलित है
  • प्याज-लहसुन, मांस-मदिरा तथा समस्त तामसिक भोजन पूर्णतः वर्जित
  • गेहूँ व गुड़ से बना भोजन तथा बूँदी के लड्डू शुभ माने जाते हैं
अनुशंसित अभ्यास:
  • ब्रह्मचर्य का पालन — व्रत-अवधि का यह अनिवार्य नियम माना जाता है
  • सूर्योदय से पूर्व, ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान
  • लाल अथवा नारंगी वस्त्र धारण करना
  • हनुमान जी को सिंदूर व चमेली का तेल अर्पित करना; चोला चढ़ाना
  • हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक तथा सामर्थ्य हो तो सुंदरकाण्ड का पाठ
  • इक्कीस मंगलवार पूरे होने पर बाईसवें मंगलवार को उद्यापन — हवन तथा दान सहित

पूजन सामग्री

हनुमान जी की प्रतिमा अथवा चित्रसिंदूर तथा चमेली का तेलचोला (लाल वस्त्र) व लाल पुष्प — विशेषतः गेंदाबूँदी अथवा बेसन के लड्डूगुड़ व चना, तथा गेहूँ से बना नैवेद्यलाल चंदन, रोली, अक्षत, मौलीघी अथवा चमेली के तेल का दीप, धूप, कर्पूरपान का पत्ता, सुपारी, नारियलतुलसी-दल तथा ऋतुफलउद्यापन हेतु — लाल वस्त्र, यज्ञोपवीत, पंचामृत, पाँच प्रकार के फल, लाल चावल, तिल-गुड़ के लड्डू

पूजन विधि (चरण-दर-चरण)

  1. मंगलवार को ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और लाल अथवा नारंगी वस्त्र धारण करें।
  2. हनुमान जी का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें — कितने मंगलवार रखेंगे, यह संकल्प में स्पष्ट कहें (परंपरा में इक्कीस)।
  3. घर के ईशान कोण में अथवा पूजा-स्थान पर हनुमान जी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
  4. लाल आसन बिछाकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  5. हनुमान जी को सिंदूर तथा चमेली का तेल अर्पित करें — यही उनका सर्वप्रिय अर्पण माना जाता है; सामर्थ्य हो तो चोला चढ़ाएँ।
  6. लाल पुष्प, विशेषतः गेंदा, तथा तुलसी-दल अर्पित करें।
  7. बूँदी अथवा बेसन के लड्डू का भोग लगाएँ; गुड़-चना भी अर्पित किया जाता है।
  8. चमेली के तेल अथवा घी का दीप जलाकर धूप दिखाएँ।
  9. "ॐ हं हनुमते नमः" का जप करें — यथासंभव एक माला।
  10. हनुमान चालीसा का पाठ करें; इसके बाद संकटमोचन हनुमानाष्टक, और सामर्थ्य हो तो सुंदरकाण्ड।
  11. मंगलवार व्रत कथा सुनें अथवा पढ़ें — व्रत इसके बिना पूर्ण नहीं माना जाता।
  12. आरती कर प्रसाद वितरित करें; परंपरा में इस दिन बंदरों को गुड़-चना तथा किसी ज़रूरतमंद को भोजन कराना पुण्य माना जाता है।
  13. दिन में एक बार, सूर्यास्त से पूर्व भोजन कर व्रत का पारण करें; दिनभर ब्रह्मचर्य का पालन करें।
  14. इक्कीस मंगलवार पूर्ण होने पर बाईसवें मंगलवार को उद्यापन करें — विधिवत पूजन, चोला अर्पण, हवन तथा गेहूँ, मसूर, गुड़ व लाल वस्त्र का दान।

व्रत कथा

एक निःसंतान दंपत्ति

बहुत समय पहले की बात है। एक ब्राह्मण दंपत्ति थे, जिनकी कोई संतान नहीं थी। इसी कारण दोनों बहुत दुःखी रहते थे।

एक बार ब्राह्मण वन में हनुमान जी की पूजा करने गया। वहाँ उसने पूजा के साथ महावीर जी से पुत्र की कामना की।

उधर घर पर उसकी पत्नी भी पुत्र-प्राप्ति के लिए मंगलवार का व्रत रखती थी। उसका नियम था कि व्रत के अंत में हनुमान जी को भोग लगाकर ही भोजन करेगी।

छह दिन की भूख

एक बार व्रत के दिन ऐसा संयोग बना कि ब्राह्मणी न भोजन बना सकी और न हनुमान जी को भोग लगा सकी।

उसने मन ही मन प्रण किया — अगले मंगलवार को हनुमान जी को भोग लगाकर ही भोजन करूँगी, उससे पहले नहीं।

वह भूखी-प्यासी छह दिन तक पड़ी रही। मंगलवार आते-आते वह बेहोश हो गई।

उसकी इस निष्ठा और लगन को देखकर हनुमान जी प्रसन्न हुए। कथा का मर्म यहीं है — फल पूजा की पूर्णता को नहीं, संकल्प की दृढ़ता को मिला।

मंगल का जन्म

हनुमान जी ने आशीर्वाद-स्वरूप ब्राह्मणी को एक पुत्र दिया और कहा — "यह तुम्हारी बहुत सेवा करेगा।"

बालक को पाकर ब्राह्मणी अत्यंत प्रसन्न हुई। उसने बालक का नाम मंगल रखा — उसी वार के नाम पर जिस दिन वह मिला।

कुछ समय बाद जब ब्राह्मण घर लौटा और बालक को देखा, तो उसने पूछा कि यह कौन है।

पत्नी ने कहा कि मंगलवार के व्रत से प्रसन्न होकर हनुमान जी ने यह बालक दिया है।

कुएँ का प्रसंग और संशय का अंत

ब्राह्मण को अपनी पत्नी की बात पर विश्वास नहीं हुआ। एक दिन अवसर देखकर उसने बालक को कुएँ में गिरा दिया।

घर लौटने पर ब्राह्मणी ने पूछा कि मंगल कहाँ है। तभी पीछे से मंगल मुस्कुराता हुआ आ गया।

उसे लौटा देखकर ब्राह्मण आश्चर्यचकित रह गया।

रात को हनुमान जी ने उसे स्वप्न में दर्शन दिए और बताया कि यह पुत्र उन्होंने ही दिया है। सत्य जानकर ब्राह्मण बहुत प्रसन्न हुआ।

इस कथा में परीक्षा भक्त की नहीं, संशय करने वाले की होती है — और यही इसे अन्य व्रत-कथाओं से अलग करता है।

इसके बाद ब्राह्मण दंपत्ति प्रत्येक मंगलवार को व्रत रखने लगे। परंपरा कहती है कि जो मनुष्य यह कथा पढ़ता या सुनता है और नियमपूर्वक व्रत रखता है, वह हनुमान जी की कृपा का पात्र बनता है और उसके कष्ट दूर होते हैं।

बड़ा मंगल — ज्येष्ठ मास की एक क्षेत्रीय परंपरा

ज्येष्ठ मास के मंगलवारों को कई क्षेत्रों में बड़ा मंगल कहा जाता है; कहीं-कहीं इसे "बुढ़वा मंगल" भी कहते हैं।

इसका सबसे विशेष रूप लखनऊ में दिखता है, जहाँ अलीगंज हनुमान मंदिर सहित नगर भर के मंदिरों में दर्शन के साथ बड़े पैमाने पर भंडारे लगते हैं। यह परंपरा लगभग चार सौ वर्ष पुरानी बताई जाती है।

इस परंपरा के आरंभ की एक कथा नवाबी काल की एक बेगम, उनके स्वप्न और उसके बाद महामारी के शमन से जोड़ी जाती है। यहाँ ईमानदारी से यह कहना आवश्यक है कि इस प्रसंग का विवरण स्रोत-दर-स्रोत बदलता है — कौन-सी बेगम, कौन-सा वर्ष, कौन-सी महामारी; इन पर स्रोत एकमत नहीं हैं। इसलिए यहाँ केवल वही दर्ज है जिस पर सब सहमत हैं: ज्येष्ठ मास, लखनऊ, अलीगंज मंदिर और भंडारे की परंपरा।

लाभ

  • परंपरा में यह व्रत संतान-प्राप्ति की कामना से विशेष रूप से रखा जाता है — कथा का केंद्रीय वरदान यही है।
  • भय, संकट व नकारात्मकता से रक्षा तथा साहस की वृद्धि की मान्यता है।
  • मंगलवार मंगल ग्रह का वार है, अतः ज्योतिष-परामर्श में मंगल-दोष की शांति के लिए भी यह व्रत सुझाया जाता है।
  • इक्कीस मंगलवार का संकल्प स्वयं में एक अभ्यास है — कथा का भाव भी यही है कि फल संकल्प की दृढ़ता को मिलता है।
  • कथा का दूसरा भाव यह है कि संशय स्वयं घर के भीतर से आ सकता है, और सत्य को प्रमाण की प्रतीक्षा करनी पड़ती है।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण
मूल परंपरालोक-प्रचलित हनुमान व्रत कथा परंपरा
स्रोतbhaktibharat.com — मंगलवार व्रत कथा (कथा का आधार-पाठ: निःसंतान ब्राह्मण दंपत्ति, छह दिन का निराहार, "मंगल" नामकरण, कुएँ का प्रसंग तथा स्वप्न-दर्शन) · acharyainduprakash.com — मंगलवार के दिन हनुमान जी का व्रत रखने के नियम (इक्कीस मंगलवार, ब्रह्मचर्य, दिन में एक बार भोजन, बूँदी लड्डू, चोला, चमेली का तेल, हनुमान चालीसा व सुंदरकाण्ड, उद्यापन में हवन व दान) · vedagya.com तथा acharyavshastri.com — उद्यापन विधि व सामग्री; बाईसवें मंगलवार को चोला अर्पण · divineroots.in, voiceoflucknow.com, etvbharat.com — बड़ा मंगल/बुढ़वा मंगल: ज्येष्ठ मास के मंगलवार, लखनऊ के अलीगंज हनुमान मंदिर की लगभग चार सौ वर्ष पुरानी भंडारा-परंपरा · ⚠️ बड़ा मंगल के आरंभ की ऐतिहासिक कथा पर स्रोत एकमत नहीं हैं (कौन-सी बेगम, कौन-सा वर्ष, कौन-सी महामारी) — इसलिए वह विवरण यहाँ नहीं दिया गया; नाम व तिथि गढ़ी नहीं गई। · ⚠️ इस व्रत कथा का कोई पुराण-अध्याय किसी उपलब्ध स्रोत में नहीं मिला, अतः इसे "लोक-प्रचलित व्रत कथा परंपरा" कहकर छोड़ा गया — किसी ग्रंथ का नाम जोड़ा नहीं गया।
अंतिम अद्यतनजून 2026

व्रत जानकारी

व्रत प्रकारवार व्रत (मंगलवार) — इक्कीस मंगलवार का संकल्प-व्रत
आराध्यश्री हनुमान
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