अमरावती नगरी में शिव-पार्वती
एक समय भगवान शिव माता पार्वती के साथ भ्रमण करते हुए मृत्युलोक में अमरावती नगरी पहुँचे। वहाँ के राजा ने एक अत्यंत भव्य व मनोहर शिव मंदिर बनवाया था, जिसकी शोभा देखकर दोनों वहीं विश्राम हेतु रुक गए।
मंदिर के रमणीय वातावरण में माता पार्वती ने प्रसन्न होकर कहा — "हे प्राणनाथ! आज इसी स्थान पर हम चौसर-पाँसे खेलें।" भगवान शिव ने सहमति दे दी और खेल आरंभ हुआ।
पुजारी का असत्य और कोढ़ का श्राप
उसी समय मंदिर का पुजारी वहाँ आ पहुँचा। माता पार्वती ने उससे पूछा — "हे ब्राह्मण! बताओ, इस खेल में जीत किसकी होगी?"
पुजारी ने बिना सोचे-विचारे, केवल भगवान शिव को प्रसन्न करने के भाव से उत्तर दिया — "इस खेल में महादेव जी के समान कोई दूसरा पारंगत नहीं; विजय अवश्य महादेव जी की होगी।"
किंतु खेल का परिणाम इसके विपरीत निकला — बाज़ी माता पार्वती जीत गईं और भगवान शिव पराजित हुए।
माता पार्वती ने पुजारी की ओर देखा और कहा — "तूने बिना जाने असत्य भविष्यवाणी की और मेरे सम्मुख पक्षपात किया। ब्राह्मण होकर असत्य बोलने का यह दंड है — जा, तू कोढ़ी हो जा!" श्राप के प्रभाव से पुजारी का शरीर तत्क्षण कुष्ठ-रोग से ग्रस्त हो गया।
भगवान शिव ने पार्वती जी को शांत करने का प्रयास किया, किंतु श्राप दिया जा चुका था। पुजारी रोग की पीड़ा सहते हुए मंदिर की सेवा से भी वंचित हो गया और दुःख में दिन काटने लगा।
अप्सराओं का उपदेश और पुजारी का उद्धार
कुछ समय पश्चात उसी मंदिर में देवलोक की कुछ अप्सराएँ शिव-पूजन हेतु आईं। उन्होंने पुजारी की दयनीय दशा देखी और करुणा से पूछा — "हे ब्राह्मण! तुम्हारी यह अवस्था कैसे हुई?"
पुजारी ने अपना सारा वृत्तांत कह सुनाया — चौसर का खेल, अपना असत्य वचन और माता पार्वती का श्राप।
अप्सराओं ने कहा — "हे ब्राह्मण! शोक न करो। तुम सोलह सोमवार का व्रत करो। लगातार सोलह सोमवार उपवास रखकर शिव-पार्वती का पूजन करो। गेहूँ के आटे, गुड़ व घी का चूरमा बनाकर उसे तीन भागों में बाँटो — एक भगवान को भोग, एक प्रसाद-रूप में वितरित, और एक स्वयं ग्रहण करो। घी का दीप जलाओ, पान-सुपारी, चंदन व पुष्प अर्पित करो। सत्रहवें सोमवार को विधिपूर्वक उद्यापन करो। इसके प्रभाव से तुम रोग-मुक्त हो जाओगे।"
पुजारी ने पूर्ण श्रद्धा व नियम से यह व्रत किया। सोलह सोमवार पूर्ण होते ही भगवान शिव की कृपा से उसका कुष्ठ-रोग पूर्णतः जाता रहा और उसका शरीर पहले की भाँति निरोग व तेजस्वी हो गया। वह पुनः मंदिर की सेवा में प्रतिष्ठित हुआ।
माता पार्वती का व्रत — कार्तिकेय का लौटना
कुछ वर्ष पश्चात भगवान शिव व माता पार्वती पुनः उसी मंदिर में पधारे। पुजारी को स्वस्थ व सुखी देखकर माता पार्वती को आश्चर्य हुआ। उन्होंने पूछा — "हे ब्राह्मण! मेरे श्राप से मिला वह भयंकर रोग तुझसे दूर कैसे हुआ?"
पुजारी ने विनम्रता से हाथ जोड़कर सारा वृत्तांत सुनाया — अप्सराओं का उपदेश और सोलह सोमवार व्रत का प्रभाव।
व्रत की इस अद्भुत महिमा को जानकर माता पार्वती अत्यंत प्रभावित हुईं। उस समय उनका पुत्र कार्तिकेय किसी कारण से रुष्ट होकर उनसे दूर चला गया था और माता का हृदय उसके वियोग में व्याकुल था।
माता पार्वती ने स्वयं यह व्रत विधिपूर्वक किया। सोलह सोमवार पूर्ण होने पर कुछ ही दिनों में कार्तिकेय का हृदय बदल गया — वे स्वयं माता के पास लौट आए और चरणों में प्रणाम किया। माता का वियोग समाप्त हुआ।
कार्तिकेय का व्रत — ब्राह्मण मित्र ब्रह्मदत्त
कार्तिकेय ने माता से पूछा — "हे माता! आपने ऐसा कौन-सा उपाय किया जिससे मेरा मन आपकी ओर खिंच आया?" माता पार्वती ने उन्हें सोलह सोमवार व्रत का माहात्म्य बताया।
कार्तिकेय का एक प्रिय ब्राह्मण मित्र था — ब्रह्मदत्त, जो बहुत समय से परदेश गया हुआ था और उसका कोई समाचार न था। मित्र-मिलन की कामना से कार्तिकेय ने भी यह व्रत किया।
व्रत के प्रभाव से ब्रह्मदत्त परदेश से लौट आया और दोनों मित्रों का पुनर्मिलन हुआ। ब्रह्मदत्त ने पूछा — "हे कार्तिकेय! इतने वर्षों बाद मेरा लौटना कैसे संभव हुआ?" कार्तिकेय ने उसे भी इस व्रत का माहात्म्य बता दिया।
ब्रह्मदत्त का व्रत — राजकुमारी से विवाह
ब्रह्मदत्त विवाह की कामना रखता था। उसने भी श्रद्धापूर्वक सोलह सोमवार का व्रत किया।
उसी समय एक राज्य में राजकुमारी का स्वयंवर रचा गया था। परंपरा के अनुसार वहाँ यह विधान रखा गया कि एक सुसज्जित हाथी जिसके गले में विजय-माला डाल देगा, राजकुमारी का विवाह उसी से होगा।
ब्रह्मदत्त भी उस सभा में उपस्थित था। शिव-कृपा से हाथी ने समस्त राजकुमारों व सामंतों को छोड़कर उसी निर्धन ब्राह्मण के गले में विजय-माला डाल दी। सबके आश्चर्य के बीच राजकुमारी का विवाह ब्रह्मदत्त से संपन्न हुआ।
विवाह के पश्चात राजकुमारी ने पूछा — "हे स्वामी! इतने राजकुमारों के बीच आपको यह सौभाग्य कैसे प्राप्त हुआ?" ब्रह्मदत्त ने उसे सोलह सोमवार व्रत का माहात्म्य विस्तार से बताया।
राजकुमारी का व्रत — गोपाल का जन्म
व्रत का माहात्म्य जानकर राजकुमारी ने संतान की कामना से यह व्रत किया — वह गुणवान व सुयोग्य पुत्र चाहती थी।
व्रत के प्रभाव से यथासमय उसे एक अत्यंत तेजस्वी व सुंदर पुत्र प्राप्त हुआ, जिसका नाम गोपाल रखा गया।
गोपाल बड़ा होकर बुद्धिमान व पराक्रमी निकला। जब उसने माता से अपने जन्म का रहस्य जाना, तो उसने भी राज्य-प्राप्ति की कामना से सोलह सोमवार का व्रत किया। व्रत के प्रभाव से समय आने पर उसे एक विशाल राज्य प्राप्त हुआ और वह राजा बना।
रानी मंगला की भूल और पुनर्मिलन
राजा गोपाल का विवाह मंगला नाम की राजकुमारी से हुआ। राजा नियमपूर्वक सोलह सोमवार व्रत करते रहे।
जब सत्रहवें सोमवार — उद्यापन का दिन — आया, तो राजा ने रानी मंगला से मंदिर चलकर पूजन में सम्मिलित होने को कहा। किंतु रानी ने आलस्य व अहंकार में स्वयं जाने के स्थान पर अपने सेवकों को भेज दिया और स्वयं महल में ही रह गईं।
उसी क्षण मंदिर में आकाशवाणी हुई — "हे राजन्! इस स्त्री ने व्रत के उद्यापन का अनादर किया है। यदि यह तेरे साथ रहेगी तो तेरा राज्य नष्ट हो जाएगा।" दैववाणी सुनकर राजा ने भारी मन से रानी को राज्य से निष्कासित कर दिया।
रानी मंगला निराश्रित होकर भटकने लगी और उसे भीषण कष्ट भोगने पड़े। कहा जाता है कि प्रकृति भी उससे रूठ गई — जहाँ वह जाती, भोजन बिगड़ जाता, जल-स्रोत सूख जाते और वृक्ष मुरझा जाते। लोग उसे अपशकुन मानकर दूर हटा देते।
भटकते हुए एक दिन वह एक शिव मंदिर पहुँची। वहाँ के दयालु पुजारी ने उसकी दशा देखकर उसे आश्रय दिया और कहा — "हे देवी! तूने जिस व्रत के उद्यापन का अनादर किया, उसी व्रत की शरण में जा। श्रद्धापूर्वक सोलह सोमवार का व्रत कर।"
रानी मंगला ने अपनी भूल स्वीकार कर पूर्ण पश्चात्ताप व श्रद्धा से यह व्रत किया और सत्रहवें सोमवार को स्वयं उपस्थित रहकर विधिपूर्वक उद्यापन किया।
व्रत पूर्ण होते ही राजा गोपाल का हृदय बदल गया। उन्होंने सेवकों को भेजकर रानी को सम्मानपूर्वक बुलवाया और दोनों का पुनर्मिलन हुआ। तत्पश्चात वे दोनों दीर्घकाल तक सुख-समृद्धि से रहे।
कथा का सार यह है कि सोलह सोमवार का व्रत श्रद्धा व नियम से किया जाए तो भगवान शिव समस्त मनोकामनाएँ — रोग-मुक्ति, स्वजन-मिलन, विवाह, संतान, राज्य व खोया सम्मान — सब प्रदान करते हैं। किंतु व्रत के उद्यापन का अनादर करने पर वही पुण्य हाथ से निकल भी जाता है — इसीलिए सत्रहवें सोमवार को स्वयं उपस्थित रहकर उद्यापन करने का विधान है।