सोमवार व्रत कथा

Somvar (Monday) Vrat Katha

वार व्रत (सोमवार)

⚠ अंश

परिचय व महत्व

सोमवार का व्रत भगवान शिव को समर्पित है। "सोम" चंद्रमा का नाम है, जो शिव के मस्तक पर विराजमान हैं — इसीलिए सोमवार शिव का सर्वाधिक प्रिय वार माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

अविवाहित कन्याएँ मनवांछित वर हेतु तथा गृहस्थ सुख-शांति, आरोग्य व संतान-सुख हेतु यह व्रत रखते हैं। श्रावण मास के सोमवार सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं, क्योंकि चातुर्मास में सृष्टि का संचालन भगवान शिव के हाथों में रहता है।

सोमवार व्रत में दिनभर उपवास रखकर संध्या को शिव पूजन व कथा-श्रवण के पश्चात एक बार भोजन किया जाता है। परंपरा में सोमवार व्रत तीन प्रकार का बताया गया है — साधारण सोमवार व्रत, सौम्य प्रदोष व्रत तथा सोलह सोमवार व्रत।

व्रत नियम (Fasting Guide)

कौन रखेकोई भी शिव भक्त — विशेषकर अविवाहित कन्याएँ मनवांछित वर हेतु तथा गृहस्थ सुख-शांति, आरोग्य व संतान-सुख हेतु।
कब रखेंप्रत्येक सोमवार; श्रावण मास के सोमवार विशेष फलदायी। संध्या पूजन के पश्चात पारण।
आहार नियम:
  • दिनभर उपवास अथवा फलाहार (सामर्थ्यानुसार)
  • संध्या शिव-पूजन के पश्चात एक बार सात्त्विक भोजन
  • प्याज-लहसुन, मांस-मदिरा तथा समस्त तामसिक भोजन वर्जित
  • परंपरा में सोमवार को नमक का त्याग अथवा सीमित प्रयोग
अनुशंसित अभ्यास:
  • शिवलिंग पर जल, दूध व बेलपत्र का अभिषेक
  • "ॐ नमः शिवाय" का जप तथा शिव चालीसा व आरती
  • श्रावण सोमवार को रुद्राभिषेक अथवा महामृत्युंजय जप
  • संध्या को कथा-श्रवण तथा निर्धनों को अन्न-दान

पूजन सामग्री

शिवलिंग अथवा शिव-पार्वती का चित्रबेलपत्रगंगाजल व कच्चा दूधसफेद पुष्प (विशेषकर धतूरा व आक)चंदन, अक्षत, भस्मदीप, धूप, कर्पूरशहद, दही, घी, शर्करा (पंचामृत हेतु)फल व मिष्ठान्न

पूजन विधि (चरण-दर-चरण)

  1. सोमवार प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें।
  2. पूजा-स्थल शुद्ध कर शिवलिंग अथवा शिव-पार्वती का चित्र स्थापित करें।
  3. शिवलिंग पर जल, कच्चा दूध व पंचामृत से अभिषेक करें और "ॐ नमः शिवाय" का उच्चारण करते रहें।
  4. बेलपत्र (चिकनी सतह नीचे की ओर), सफेद पुष्प, चंदन, अक्षत व भस्म अर्पित करें।
  5. दिनभर उपवास रखकर शिव-नाम का स्मरण व जप करें।
  6. संध्या को पुनः स्नान कर शिव चालीसा तथा सोमवार व्रत कथा का पाठ करें।
  7. धूप-दीप से आरती कर भोग अर्पित करें और प्रसाद वितरित करें।
  8. तत्पश्चात एक बार सात्त्विक भोजन कर व्रत संपन्न करें।

व्रत कथा

संतानहीन साहूकार

प्राचीन काल में किसी नगर में एक धनी साहूकार रहता था। धन-धान्य, वैभव, यश — उसके पास सब कुछ था, किंतु एक अभाव उसके जीवन को भीतर से खोखला किए हुए था: उसके कोई संतान नहीं थी।

इस दुःख के निवारण हेतु वह भगवान शिव का परम भक्त बन गया। वह प्रत्येक सोमवार नियमपूर्वक व्रत रखता, शिव मंदिर जाकर शिवलिंग का जल-दूध से अभिषेक करता, बेलपत्र अर्पित करता और दीप जलाकर संध्या तक पूजा करता।

वर्षों तक उसकी यह साधना अखंड चलती रही — न किसी सोमवार का नागा, न श्रद्धा में कोई कमी।

माता पार्वती की प्रार्थना

एक सोमवार जब साहूकार मंदिर में पूजा कर रहा था, माता पार्वती ने उसकी अटूट भक्ति देखी। उन्हें उस पर दया आ गई और उन्होंने भगवान शिव से कहा — "हे प्राणनाथ! यह आपका सच्चा भक्त है और वर्षों से नियमपूर्वक आपका व्रत कर रहा है। इसके मन में संतान की कामना है। कृपया इसकी इच्छा पूर्ण कीजिए।"

भगवान शिव बोले — "हे पार्वती! संसार में प्रत्येक जीव को अपने शुभ-अशुभ कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है। जिसके भाग्य में जो लिखा है, वही उसे मिलता है। इसके भाग्य में संतान नहीं है।"

किंतु माता पार्वती ने आग्रह नहीं छोड़ा — "हे स्वामी! जब भक्त इतनी श्रद्धा से आपकी शरण में है, तो कृपा का कोई मार्ग अवश्य निकालिए।"

पार्वती जी के बार-बार आग्रह से भगवान शिव द्रवित हो गए और बोले — "अच्छा, इसे पुत्र-प्राप्ति का वर देता हूँ। किंतु एक शर्त है — वह बालक केवल बारह वर्ष तक जीवित रहेगा। इससे अधिक नहीं।" साहूकार यह वार्तालाप सुन रहा था। उसने सोचा — "संतान का सुख कुछ वर्ष ही मिले, तो भी वह न होने से अच्छा है।" उसने न हर्ष प्रकट किया, न शोक; वह पहले की भाँति शिव-भक्ति में लगा रहा।

पुत्र का जन्म और काशी-यात्रा

शिव-कृपा से कुछ काल पश्चात साहूकार के घर एक अत्यंत सुंदर व तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ। घर में उत्सव मनाया गया, किंतु साहूकार के मन में वह शर्त सदा चुभती रही। उसने यह बात किसी को नहीं बताई।

बालक बड़ा होकर बुद्धिमान व सुशील निकला। जब वह ग्यारह वर्ष का हुआ, तो साहूकार ने सोचा कि शेष समय में इसे विद्या व सत्संग का लाभ मिले, तो जीवन सार्थक हो जाए।

उसने बालक के मामा को बुलाकर कहा — "इसे विद्या-अध्ययन हेतु काशी ले जाओ। मार्ग में जहाँ-जहाँ ठहरो, वहाँ यज्ञ कराओ, ब्राह्मणों को भोजन कराओ और दान करो।" मामा-भानजे यात्रा पर निकल पड़े और मार्ग में यही करते चले।

मार्ग में हुआ विवाह

यात्रा के दौरान वे एक नगर में पहुँचे, जहाँ उस समय राजकुमारी का विवाह-उत्सव चल रहा था। किंतु वहाँ एक विचित्र स्थिति थी — जो वर आया था, वह एक आँख से हीन था, और उसके पिता को भय था कि यह बात प्रकट होते ही विवाह टूट जाएगा।

वर-पक्ष के लोगों की दृष्टि साहूकार-पुत्र पर पड़ी। उसका रूप व तेज देखकर उन्होंने उसके मामा से अनुरोध किया — "विवाह की वेदी पर कुछ समय के लिए इस बालक को वर के स्थान पर बैठा दीजिए; विवाह के पश्चात हम राजकुमारी को अपने वर के साथ ले जाएँगे।"

द्रव्य के लोभ में मामा ने स्वीकार कर लिया। विधिपूर्वक विवाह संपन्न हुआ और साहूकार-पुत्र ने राजकुमारी के साथ अग्नि के समक्ष फेरे लिए।

किंतु वह बालक स्वभाव से सत्यनिष्ठ था। विदाई से पूर्व उसने राजकुमारी की चुनरी के छोर पर अपनी सारी बात लिख दी — "मेरा विवाह तुमसे हुआ है, किंतु जो वर तुम्हें ले जाएगा वह काना है। मैं काशी विद्या-अध्ययन हेतु जा रहा हूँ। और यह भी जान लो — मेरी आयु केवल बारह वर्ष है।"

जब राजकुमारी ने यह पढ़ा, तो उसने वर-पक्ष के साथ जाने से स्पष्ट इंकार कर दिया और कहा — "मैंने अग्नि को साक्षी मानकर जिसके साथ फेरे लिए हैं, वही मेरा पति है। उसकी आयु जो भी हो, मैं अपना भाग्य स्वीकार करती हूँ।" उसके माता-पिता ने उसका निश्चय देखकर उसे अपने पास ही रख लिया।

बारहवें वर्ष में मृत्यु

साहूकार-पुत्र काशी पहुँचा और वहाँ मामा के साथ विद्या-अध्ययन करने लगा। नियम के अनुसार वे प्रतिदिन यज्ञ कराते व ब्राह्मणों को भोजन कराते रहे।

समय बीतता गया और वह दिन आ गया जब बालक की आयु पूरे बारह वर्ष की हो गई। उस दिन भी उन्होंने यज्ञ किया। यज्ञ की समाप्ति पर बालक ने कहा — "मामा जी, मेरा शरीर अस्वस्थ लग रहा है; मैं कुछ विश्राम करना चाहता हूँ।" वह भीतर जाकर लेट गया।

कुछ समय पश्चात मामा ने भीतर जाकर देखा — भानजे के प्राण निकल चुके थे। मामा का हृदय फट गया। वह विलाप करने लगा, किंतु उसे यह भी ध्यान रहा कि यज्ञ-स्थल पर एकत्र ब्राह्मण व अतिथि विघ्न न पाएँ, अतः उसने पहले सबका भोजन-सत्कार पूर्ण किया और फिर फूट-फूटकर रोने लगा।

भगवान शिव की कृपा और पुनर्जीवन

संयोग से उसी समय भगवान शिव व माता पार्वती उस मार्ग से जा रहे थे। मामा का करुण विलाप सुनकर माता पार्वती का हृदय द्रवित हो उठा।

उन्होंने कहा — "हे महादेव! इस विलाप को सुनिए। यह किसी की मृत्यु पर रो रहा है; इसकी पीड़ा असह्य है। कृपया इस पर दया कीजिए।"

भगवान शिव ने बालक को देखा और पहचान लिया — "हे पार्वती! यह उस साहूकार का पुत्र है, जिसे तुम्हारे आग्रह पर मैंने बारह वर्ष की आयु का वर दिया था। इसकी अवधि पूर्ण हो चुकी है।"

माता पार्वती बोलीं — "हे प्राणनाथ! यदि यह बालक जीवित नहीं होगा तो इसके माता-पिता भी पुत्र-वियोग में प्राण त्याग देंगे। और वह साहूकार आज भी आपका अनन्य भक्त है। कृपया इसे जीवनदान दीजिए।"

भगवान शिव प्रसन्न होकर बोले — "तथास्तु।" उसी क्षण बालक के शरीर में प्राण लौट आए और वह उठकर बैठ गया, जैसे गहरी निद्रा से जागा हो।

घर वापसी और शुभ समाचार

बालक ने विद्या-अध्ययन पूर्ण किया और मामा के साथ अपने नगर की ओर लौट चला। मार्ग में वे उसी नगर में रुके जहाँ उसका विवाह हुआ था।

राजा ने उसे पहचान लिया और अत्यंत हर्षित हुए। उन्होंने बड़े समारोह के साथ अपनी पुत्री को विदा किया और दहेज सहित उसे साथ भेजा।

उधर उसके माता-पिता ने बारह वर्ष पूर्ण होने पर मान लिया था कि पुत्र नहीं रहा। पिता ने अन्न-जल त्यागकर छत पर यह प्रण किया था कि पुत्र का समाचार मिलने तक वह न कुछ खाएगा, न पानी पिएगा।

उसी रात्रि भगवान शिव ने साहूकार को स्वप्न में दर्शन देकर कहा — "हे भक्त! तेरा पुत्र जीवित है और अपनी पत्नी सहित लौट रहा है। तेरे सोमवार व्रत के पुण्य से मैंने उसे जीवनदान दिया है।"

प्रातः पुत्र अपनी नववधू सहित द्वार पर आ पहुँचा। साहूकार-दंपती का हर्ष अपार था। समस्त नगर में उत्सव मनाया गया और वे सब सुखपूर्वक रहने लगे।

कथा का सार यह है कि श्रद्धापूर्वक किया गया सोमवार व्रत भगवान शिव की ऐसी कृपा दिलाता है, जो निश्चित भाग्य को भी बदल देती है — वह संतान, आयु, आरोग्य व समस्त मनोकामनाएँ प्रदान करता है।

लाभ

  • मनवांछित वर तथा विवाह संबंधी बाधाओं का निवारण
  • संतान-प्राप्ति व संतान की आयु-रक्षा
  • आरोग्य, दीर्घायु व अकाल-मृत्यु से रक्षा
  • गृहस्थ जीवन में सुख-शांति व समृद्धि
  • भगवान शिव की विशेष कृपा — जो भाग्य को भी बदल देती है

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति⚠ अंश
मूल परंपराशिव पुराण परंपरा
स्रोतशिव पुराण परंपरा — सोमवार व्रत माहात्म्य · साहूकार-पुत्र, शिव-पार्वती संवाद व काशी-यात्रा प्रसंग (लोक-प्रचलित पौराणिक कथा परंपरा)
अंतिम अद्यतनजून 2026

संपादकीय टिप्पणी: यह व्रत कथा का सारगर्भित रूप है, प्रामाणिक स्रोतों से सत्यापित। विस्तृत विधि व मुहूर्त हेतु किसी विद्वान/पुरोहित से परामर्श लें।

व्रत जानकारी

व्रत प्रकारवार व्रत (सोमवार)
आराध्यश्री शिव
आज का पंचांग

सोमवार व्रत कथा — सामान्य प्रश्न