गोत्र और जाति में अंतर — क्या अलग जाति में एक ही गोत्र हो सकता है?

जाति विवाह का बाहरी घेरा और गोत्र भीतरी — एक ही गोत्र-नाम कई जातियों में, क्षत्रियों का पुरोहित-प्रवर, और 1916 के अभिलेख में "कश्यप" गोत्र कई समुदायों में। प्रवरमञ्जरी और ऐतिहासिक अभिलेखों से।

संक्षेप में

जाति और गोत्र विवाह के दो अलग नियम हैं। Russell (1916) के अभिलेख के अनुसार जाति या उपजाति वह बाहरी घेरा थी जिसके भीतर विवाह होता था, और गोत्र उसके भीतर का समूह जिसमें विवाह नहीं होता। एक ही गोत्र-नाम कई जातियों में मिलता है। प्रवरमञ्जरी के अनुसार क्षत्रियों के लिए पुरोहित का प्रवर बताया गया है, जो इसका एक कारण है।

दो घेरे

यह तालिका Russell और Hira Lal (1916) के वर्णन पर आधारित है। गोत्र-प्रवर ग्रंथ जाति के बारे में नियम नहीं देते; वे गोत्र और प्रवर के नियम देते हैं।

जाति / उपजातिगोत्र
विवाह-नियमभीतर विवाह (अभिलेख के अनुसार)भीतर विवाह नहीं
आधारसामाजिक समूहऋषि-वंश (ग्रंथों में)
क्या एक नाम दूसरे में मिलता है—हाँ, एक गोत्र-नाम कई जातियों में

अलग जाति में एक ही गोत्र — कैसे

प्रवरमञ्जरी (p. 4) के अनुसार क्षत्रियों के लिए उनका अपना प्रवर और पुरोहित का प्रवर बताया गया है, और पृष्ठ 128 पर: राजाओं के विवाह में वही प्रवर लिया जाए जो उनके पुरोहित बोलते हैं। इस तरह एक ऋषि-गोत्र पुरोहित-परंपरा से दूसरे परिवारों तक पहुँचता है।

Russell (1916) के अभिलेख में भी यह दिखता है: "कश्यप" उनकी सूची में ब्राह्मणों का एक आम गोत्र होने के साथ सत्रह और समुदायों का भी एक गोत्र-विभाग दर्ज है। कुछ समुदायों के बारे में वे लिखते हैं कि उनके अपने विभागों के साथ "ब्राह्मणों वाले" गोत्र भी थे।

इसलिए अलग जातियों में एक ही गोत्र-नाम होने से यह सिद्ध नहीं होता कि उनका साझा रक्त-वंश है — कई जगह वह पुरोहित या परंपरा से आया नाम है।

"सब कश्यप गोत्र के" — एक अभिलेख

Russell (1916) दर्ज करते हैं कि कुछ समुदाय कहते थे कि वे सब कश्यप गोत्र के हैं, और इसका कारण वे यह बताते थे कि कच्छप (कछुआ) पृथ्वी को धारण करता है, इसलिए सब मनुष्यों का पूर्वज है। एक और समुदाय के बारे में वे लिखते हैं कि वे सब स्वयं को कश्यप गोत्र का कहते थे, पर विवाह के लिए गाँव या पेशे के नाम वाले अलग विभाग मानते थे।

यह "गोत्र न पता हो तो कश्यप" वाली परंपरा से मिलती-जुलती बात है। ग्रंथों में उस वचन की सीमा क्या है, यह "गोत्र पता न हो तो संकल्प" लेख में है।

यह ब्रिटिश-काल की जनगणना-ethnography का ऐतिहासिक अभिलेख है — उस समय और क्षेत्र की स्थिति, आज की नहीं।

विवाह पर इसका अर्थ

गोत्र-प्रवर ग्रंथों का सगोत्र-नियम एक ही वर्ण-परंपरा के भीतर लिखा गया है। अलग-अलग जातियों के बीच एक गोत्र-नाम होने पर क्या नियम हो, इस पर हमें कोई ग्रंथ-वचन नहीं मिला; इसलिए हम कोई नियम नहीं लिखते। हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 में न जाति की और न गोत्र की कोई शर्त है।

स्रोत

गोत्र और जाति में अंतर — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न