गौड़ सारस्वत (शेणवी) ब्राह्मण — गोत्र और कुलदेवता

गौड़ सारस्वत (शेणवी) ब्राह्मणों के कुलदेवता मंगेश, शांतादुर्गा, महालक्ष्मी आदि, जिनके मंदिर गोवा में हैं; 18 गोत्र (Enthoven 1920) और रत्नागिरी के शेणवियों के गोत्रों के नाम (Gazetteer 1880); 13 उप-विभाग, मठ और स्वामी।

संक्षेप में

Enthoven (1920) के अभिलेख में गौड़ सारस्वत (शेणवी) ब्राह्मणों के कुलदेवता मंगेश, शांतादुर्गा, महालक्ष्मी आदि लिखे हैं, जिनके मंदिर गोवा में हैं; वे ऋग्वेदी हैं और उनके 18 गोत्र हैं। Ratnagiri Gazetteer (1880) के अनुसार गोवा छोड़ने के बाद भी हर परिवार की एक निजी मूर्ति वहीं थी।

कुलदेवता — गोवा के मंदिर

  • कुलदेवता: मंगेश, शांतादुर्गा, महालक्ष्मी आदि — सबके मंदिर गोवा में (Enthoven 1920, खंड 1, p. 251)।
  • रत्नागिरी के शेणवियों के प्रमुख गृह-देवी-देवता: मंगिरीश (मंगेश), महालक्ष्मी, म्हाळसा, शांतादुर्गा, नागेश, बिंदुमाधव और सप्तकोटीश्वर (Gazetteer 1880, p. 117)।
  • पुर्तगालियों के धर्म-परिवर्तन से बचने के लिए गोवा छोड़ने पर भी हर परिवार की एक निजी मूर्ति वहीं रही (Gazetteer, p. 116) — यानी कुलदेवता का स्थान गोवा में ही बना रहा।
  • मंगेश-माहात्म्य की परंपरा: कान्यकुब्ज से आए देवशर्मा, लोमशर्मा और शिवशर्मा ने इस समाज को और बढ़ाया; गोवा में मंगेश और शांतादुर्गा की मूर्तियों के आगे उनकी स्मृति की आकृतियाँ हैं, और कहा जाता है कि ये मूर्तियाँ वे तिरहुत से लाए थे (Enthoven, p. 250)।

गोत्र

Enthoven (1920) लिखते हैं कि गौड़ सारस्वतों के 18 गोत्र हैं, पर उनके नाम नहीं देते (p. 251)। Ratnagiri Gazetteer (1880) रत्नागिरी के शेणवियों के प्रसंग में "दस गोत्र" कहकर ये नौ नाम देता है: भारद्वाज, कौशिक, वत्स, कौण्डिन्य, काश्यप, वासिष्ठ, जामदग्न्य, विश्वामित्र और गौतम (p. 116, टिप्पणी 5)। दसवाँ नाम छपा ही नहीं।

ये दोनों आँकड़े अलग क्षेत्र और समय के हैं — एक पूरे बंबई प्रांत (1920) का, दूसरा केवल रत्नागिरी ज़िले (1880) का। इसलिए दोनों में अंतर स्वाभाविक है।

उप-विभाग, संप्रदाय और मठ

  • Enthoven (1920) 13 अंतर्विवाही उप-विभाग गिनाते हैं: बार्देशकर, भालावलकर, दिवाडकर, गौड़ सारस्वत (शेणवी, सासष्टीकर या कोंकणी सहित), काजुळे, खडपे, किर्लोस्कर, कुडाळदेशकर, लोटलीकर, नरवणकर, पेडणेकर, राजपूरकर, और सारस्वत (कुशस्थली या शेणैपैकी) (p. 251)।
  • संप्रदाय: सासष्टीकर और बार्देशकर वैष्णव; बाक़ी सब स्मार्त; वेद: ऋग्वेद (Enthoven, p. 251)।
  • स्वामी और मठ: 1920 में कवळे (गोवा), गोकर्ण, नासिक, काशी आदि में मठ (Enthoven, p. 251); 1880 में दो स्वामी — एक स्मार्त, कानड़ा के सोनवडा में, और एक वैष्णव, गोवा में (Gazetteer, p. 117)।
  • कुल-पुरोहित: गोवा, कानड़ा और समाज के अन्य केंद्रों में अपनी ही जाति के; अन्य जगह कऱ्हाडे, चित्पावन या देशस्थ (Enthoven, p. 251)।

परंपरा

अभिलेख के अनुसार यह समाज अपनी वंश-परंपरा सरस्वती नदी के तट पर रहने वाले ऋषि सारस्वत से जोड़ता है, जिन्होंने बारह वर्ष के अकाल में वेदों को बचाए रखा। सह्याद्रि-खण्ड के अनुसार परशुराम इन्हें कोंकण लाए और गोमांचल (गोवा) दिया, जहाँ ये पहले 96 गाँवों में बसे। "शेणवी" नाम की तीन व्याख्याएँ दर्ज हैं — 96 (शहाण्णव) गाँव, 96 परिवार, या "शानभोग" (ग्राम-लेखापाल) (Enthoven, p. 250)।

यह ब्रिटिश-काल के अभिलेख (1880 और 1920) की जानकारी है — उस समय और क्षेत्र की स्थिति, आज की नहीं। हर परिवार की परंपरा इससे अलग हो सकती है।

इन गोत्रों के पृष्ठ (प्रवर और गण सहित)

स्रोत

गौड़ सारस्वत (शेणवी) ब्राह्मण — गोत्र, कुलदेवता और मठ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न