विभागों के चार प्रकार (1916 का अभिलेख)
Russell और Hira Lal, Risley का वर्गीकरण देते हुए, विवाह से अलग रखे जाने वाले विभागों के नामों को चार प्रकार में बाँटते हैं:
| प्रकार | नाम कहाँ से | उदाहरण (अभिलेख से) |
|---|---|---|
| ऋषि-नाम (eponymous) | वेद-पुराण के ऋषि | वसिष्ठ, गर्ग, भारद्वाज, विश्वामित्र, कश्यप |
| स्थान (territorial) | गाँव या क्षेत्र | गाँव के नाम वाले विभाग |
| उपाधि (titular) | पद या पेशा | उपाधि वाले नाम |
| प्रतीक (totemistic) | पशु, पौधा या वस्तु | नाग आदि |
समुदायों के अपने गोत्र
अभिलेख में कुछ समुदाय अपने गोत्रों की उत्पत्ति अपने किसी पूर्वज से बताते हैं — उदाहरण के लिए अग्रवाल समुदाय के साढ़े सत्रह गोत्र, जिन्हें राजा अग्रसेन के पुत्रों से जोड़ा गया है। ऐसे गोत्र गोत्र-प्रवर ग्रंथों के गणों में नहीं हैं, क्योंकि उनका आधार ऋषि-वंश नहीं।
कुछ समुदायों में दोनों तरह के विभाग साथ चलते थे: Russell एक समुदाय के बारे में लिखते हैं कि उनके मुख्य विभाग राजपूत कुलों के नाम पर थे, और उनके भीतर "ब्राह्मणों वाले" ऋषि-गोत्र भी।
यह ब्रिटिश-काल की जनगणना-ethnography का ऐतिहासिक अभिलेख है — उस समय और क्षेत्र की स्थिति, आज की नहीं।
इस साइट पर
इस साइट के 42 गोत्र-पृष्ठ और 3,140 गोत्र-नामों की सूची गोत्र-प्रवर ग्रंथ (गोत्रप्रवरनिबन्धकदम्बम्, 1900) से हैं — यानी ऋषि-गोत्र। समुदायों के अपने गोत्रों (जैसे जाट, अग्रवाल, राजपूत कुल) के पृष्ठ अभी नहीं बनाए गए; उनके लिए क्षेत्र-वार विश्वसनीय स्रोत चाहिए।
अगर आपका गोत्र इस साइट की सूची में नहीं है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह "गलत" है — वह आपके समुदाय की परंपरा का गोत्र हो सकता है।
