कुलदेवता का अर्थ
ग्रंथ "कुलदेवता" के साथ प्रायः "स्व" जोड़ते हैं — "स्वस्वकुलदेवता", "स्वकुलदेवता", यानी अपना-अपना। कुलदेवता किसी एक देवता का नाम नहीं; हर कुल का अपना है। किसी के कुलदेवता शिव या विष्णु के किसी रूप हैं, किसी की कुलदेवी किसी विशेष स्थान की देवी।
ग्रंथ यह नहीं बताते कि किस कुल के कुलदेवता कौन हैं। यह परिवार की परंपरा का विषय है — और जिन गोत्र-प्रवर ग्रंथों से इस साइट के गोत्र लिए गए हैं, उनमें भी किसी गोत्र के साथ कोई कुलदेवता नहीं लिखा।
संस्कारों में कुलदेवता
संस्काररत्नमाला के प्रयोगों में कुलदेवता इन अवसरों पर आते हैं:
| अवसर | क्या करते हैं | स्रोत |
|---|---|---|
| जातकर्म (जन्म के तुरंत बाद) | पिता कुलदेवता और कुल के बड़ों को प्रणाम करके नवजात का मुख देखता है | संस्काररत्नमाला भाग 2, p. 834 |
| नान्दीश्राद्ध (मंगल-कार्य से पहले का आभ्युदयिक श्राद्ध) | ब्राह्मणों को दक्षिणा देने के बाद कुलदेवता को नमस्कार, फिर "माता पितामही चैव…" श्लोक — पितर प्रसन्न होकर मंगल दें | संस्काररत्नमाला भाग 1, p. 45 |
| उपनयन (मुहूर्त का क्षण) | ब्राह्मणों द्वारा मंगल-सूक्त और पद्यों के पाठ के बीच अपने कुलदेवता आदि का चिंतन | संस्काररत्नमाला भाग 1, p. 205 |
| नवरात्र | अपने कुलदेवता का पूजन; कलश पर या उनके अपने स्थान पर | धर्मसिन्धुसार p. 66–67 |
कुलदेवी कुल की होती है, गोत्र की नहीं
ऐतिहासिक अभिलेख भी यही दिखाते हैं। Enthoven (1920) के अभिलेख में बंबई प्रांत के एक समुदाय (आलितकर) के बारे में लिखा है कि उसकी हर शाखा का अपना अलग कुलदेवता है, और एक ही कुलदेवता वाले परिवारों में विवाह नहीं होता। एक और समुदाय (सातारकर) के बारे में दर्ज है कि जिनकी कुलदेवी एक है, वे एक ही कुल के माने जाते हैं और आपस में विवाह नहीं करते।
यानी कुछ समुदायों में कुलदेवी स्वयं एक "कुल" की पहचान थी — गोत्र से अलग। इसलिए किसी गोत्र से कुलदेवी का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। एक ही गोत्र के दो परिवारों की कुलदेवियाँ अलग हो सकती हैं।
यह ब्रिटिश-काल के अभिलेख (1880 और 1920) की जानकारी है — उस समय और क्षेत्र की स्थिति, आज की नहीं। हर परिवार की परंपरा इससे अलग हो सकती है।
अपनी कुलदेवी या कुलदेवता कैसे जानें
- परिवार के बड़ों से पूछें — विशेषकर यह कि विवाह, मुंडन या जनेऊ से पहले घर में किस देवी-देवता की पूजा होती थी।
- कुल-पुरोहित या परिवार के पुराने पुरोहित-परिवार से।
- पैतृक गाँव का वह मंदिर जहाँ परिवार मन्नत या मुंडन के लिए जाता रहा है।
- नवरात्र में घर की परंपरा — घटस्थापन किसके नाम से होता है, और कलश पर किसकी प्रतिमा या चित्र रखा जाता है।
- यदि कोई जानकारी न मिले, तो कोई "गोत्र से कुलदेवी" वाली सूची न अपनाएँ — ग्रंथ ऐसी कोई सूची नहीं देते।
