कुलदेवी
- Enthoven (1920): कुलदेवियाँ महालक्ष्मी, दुर्गा, म्हाळसा, भवानी आदि (खंड 1, p. 247)।
- Ratnagiri Gazetteer (1880): उपासना चित्पावनों जैसी; प्रमुख गृह-देवियाँ — चित्पावनों वाली देवियों के अलावा — महालक्ष्मी और दुर्गा (p. 114)।
- अभिलेख "आदि" लिखते हैं — यानी सूची पूरी नहीं। एक समाज के परिवारों की कुलदेवियाँ अलग-अलग होती हैं।
गोत्र — दो अभिलेख, दो बातें
Ratnagiri Gazetteer (1880) लिखता है कि कऱ्हाडों के कई गोत्र हैं, जिनकी ठीक संख्या ज्ञात नहीं (p. 114)। Enthoven (1920) 24 गोत्र लिखते हैं (p. 247)। दोनों में से कोई भी गोत्रों के नाम नहीं देता।
इसलिए हम यहाँ कोई गोत्र-सूची नहीं दे रहे। अपना गोत्र परिवार से जानें, और फिर उसका प्रवर और गण इस साइट की गोत्र-सूची में देखें।
नाम, क्षेत्र और वेद
- नाम: सातारा ज़िले का कराड, कृष्णा और कोयना का पवित्र संगम। Gazetteer के अनुसार ये संभवतः उस ऋषि या तपस्वी के वंशज हैं जिसने इस संगम को अपना निवास चुना (p. 114)।
- मूल क्षेत्र: कृष्णा के किनारे, कोयना-संगम से दक्षिण में वेदवती (वारणा) तक; 1880 तक ये महाराष्ट्र के दूसरे ब्राह्मणों की तरह दूर-दूर तक फैल चुके थे (Gazetteer, p. 114)।
- वेद और संप्रदाय: सब ऋग्वेदी और स्मार्त; पुरोहित अपनी ही जाति के (Enthoven, p. 247)।
- उप-विभाग: 1880 में कोई नहीं — सब आपस में भोजन और विवाह करते थे; कभी-कभी देशस्थों से भी विवाह (Gazetteer, p. 114; Enthoven, p. 247)।
- मराठी कवि मोरोपंत (1750) इसी समाज के थे (Gazetteer, p. 114 की टिप्पणी)।
ध्यान रखें
यह ब्रिटिश-काल के अभिलेख (1880 और 1920) की जानकारी है — उस समय और क्षेत्र की स्थिति, आज की नहीं। हर परिवार की परंपरा इससे अलग हो सकती है।
इस समाज के बारे में अभिलेखों में कुछ पुरानी अपमानजनक कथाएँ और अटकलें भी हैं। हमने उन्हें तथ्य नहीं माना और यहाँ नहीं दिया।
FAQ
कऱ्हाडे ब्राह्मण — गोत्र, वेद और कुलदेवी — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Enthoven (1920) के अनुसार महालक्ष्मी, दुर्गा, म्हाळसा, भवानी आदि; Ratnagiri Gazetteer (1880) के अनुसार प्रमुख गृह-देवियाँ महालक्ष्मी और दुर्गा।
Enthoven (1920) 24 लिखते हैं; Ratnagiri Gazetteer (1880) कहता है कि संख्या ठीक-ठीक ज्ञात नहीं। गोत्रों के नाम दोनों में नहीं।
सातारा ज़िले के कराड से, जहाँ कृष्णा और कोयना नदियों का संगम है।
दोनों अभिलेखों के अनुसार सब ऋग्वेदी हैं, और स्मार्त संप्रदाय के।
दोनों अभिलेख लिखते हैं कि कऱ्हाडे कभी-कभी देशस्थों से विवाह करते थे।
