छोटे से बड़े घेरे
यही कारण है कि दो लोग एक गोत्र के होकर भी एक-दूसरे को बिल्कुल न जानते हों — गोत्र परिवार नहीं, बहुत बड़ा वंश-समूह है।
| घेरा | अर्थ | स्रोत |
|---|---|---|
| परिवार | घर के लोग, एक-दो पीढ़ी | — |
| सपिण्ड | सातवीं पीढ़ी तक के संबंधी | मनु V.60 |
| समानोदक | जब तक साझा मूल और कुल-नाम ज्ञात हो | मनु V.60 |
| गोत्र | एक ऋषि-वंश का नाम; हज़ारों परिवार | बौधायन |
| गण | एक प्रवर वाले गोत्र | प्रवरमञ्जरी |
| ऋषि-कुल | एक मूल ऋषि के सब गण | प्रवरमञ्जरी pp. 3–4 |
गोत्र कितना बड़ा है
बौधायन कहते हैं कि गोत्र हज़ारों-करोड़ों हैं, पर प्रवर 49 ही। Russell और Hira Lal (1916) ने अपने समय में दर्ज किया कि ब्राह्मणों के वही गोत्र उनकी लगभग सभी उपजातियों में मिलते हैं — यानी एक गोत्र कई क्षेत्रों और समूहों में फैला हुआ है।
ऐतिहासिक अभिलेख: यह 1916 की स्थिति का विवरण है, आज का सर्वेक्षण नहीं।
जब व्यक्ति का गोत्र बदलता है
चतुर्णामपि वर्णानां पितॄणां पितृगोत्रतः। पितृगोत्रं कुमारीणामूढानां भर्तृगोत्रतः॥चारों वर्णों में पितरों का पिता के गोत्र से; कुमारी कन्याओं का पिता का गोत्र; और विवाहित स्त्रियों का पति के गोत्र से।
यानी विवाह से स्त्री पति के परिवार और गोत्र में आती है। Russell (1916) भी अपने समय का यही नियम दर्ज करते हैं: गोत्र पिता की ओर से चलता है, विवाह पर स्त्री पति के समूह में ली जाती है और संतान भी उसी की होती है।
गोद लेने पर: संस्काररत्नमाला (भाग 1, p. 552) के अनुसार दत्तक पुत्र उसका गोत्र बोलता है जिसने उसे गोद लिया। और जिसे अपना गोत्र पता न हो, वह प्रवरमञ्जरी (p. 128) के अनुसार आचार्य का गोत्र अपनाता है।
