गोत्र: ऋषि-वंश
अपत्यं पौत्रप्रभृति गोत्रम्।पौत्र से आगे की संतान "गोत्र" है — पाणिनि का सूत्र, जिसे संस्काररत्नमाला गोत्र के लक्षण के साथ उद्धृत करती है।
बौधायन के अनुसार गोत्र सात ऋषियों और आठवें अगस्त्य की संतान है, और पाणिनि के सूत्र के अनुसार ऋषि का पौत्र और आगे की पूरी संतान गोत्र है। यानी गोत्र बहुत बड़ा समूह है — बौधायन कहते हैं कि गोत्र हज़ारों, लाखों, करोड़ों हैं।
कुल: परिवार की परंपरा
…he should have the arrangement of (the boy's) hair made according to the custom of his Gotra and of his family.(चूडाकरण में) बालक के केशों की रचना उसके गोत्र और कुल की रीति के अनुसार कराए — सूत्र गोत्र और कुल को अलग-अलग गिनता है ("यथागोत्रकुलकल्पम्")।
यह सूत्र दिखाता है कि रीतियाँ दो स्तर पर तय होती थीं — गोत्र की और कुल की। संस्काररत्नमाला (भाग 2, p. 834) के जातकर्म-प्रयोग में भी कुल का अलग स्थान है: पुत्र के जन्म पर पिता "कुलदेवता और कुल के बड़ों" को प्रणाम करके उसका मुख देखता है। कुलदेवता और कुल-वृद्ध कुल के होते हैं, गोत्र के नहीं।
ऐतिहासिक अभिलेख में "कुल"
Russell और Hira Lal (1916) लिखते हैं कि विवाह से अलग रखे जाने वाले समूहों के कई स्थानीय नाम थे: "गोत्र" (जिसका अर्थ वे गोशाला बताते हैं), "खेड़ा" (गाँव), "मूल" (जड़, उत्पत्ति), और "कुल" या "कुरी" (परिवार)। यानी कई समुदायों में वही काम जो गोत्र करता है, "कुल" नाम का समूह करता था।
यह ब्रिटिश-काल की जनगणना-ethnography का ऐतिहासिक अभिलेख है — उस समय और क्षेत्र की स्थिति, आज की नहीं।
इस साइट पर "ऋषि-कुल" का अर्थ
गोत्र-प्रवर ग्रंथों में "कुल" शब्द एक तीसरे अर्थ में भी आता है: प्रवरमञ्जरी भृगुओं, आङ्गिरसों, अत्रियों आदि के "गोत्र-प्रवर-काण्ड" अलग रखती है। इस साइट पर इन्हें "ऋषि-कुल" कहा गया है — जैसे भृगु-कुल (11 गण), वसिष्ठ-कुल (5 गण)। यह परिवार वाला कुल नहीं, गोत्रों का सबसे बड़ा समूह है।
| शब्द | अर्थ | आकार |
|---|---|---|
| कुल (परिवार) | एक परिवार की वंश-परंपरा, उसकी रीतियाँ और कुलदेवता | कुछ पीढ़ियाँ |
| गोत्र | ऋषि-वंश का नाम | हज़ारों परिवार |
| गण | एक प्रवर वाले गोत्रों का समूह | कई गोत्र (ग्रंथ में 73 गण) |
| ऋषि-कुल | एक मूल ऋषि के सब गण | ग्रंथ में 9 |
