ग्रंथों में कुलदेवता
जातमात्रे पुत्रे … तस्य मुखं कुलदेवताकुलवृद्धप्रणामपूर्वकमालोक्य…पुत्र के जन्म लेते ही (पिता) कुलदेवता और कुल के बड़ों को प्रणाम करके उसका मुख देखे…
यहाँ कुलदेवता कुल के बड़ों के साथ आते हैं — परिवार की परंपरा के हिस्से के रूप में। जिन गोत्र-प्रवर ग्रंथों से इस साइट के 73 गण और 3,140 गोत्र-नाम लिए गए हैं, उनमें किसी गोत्र का कोई कुलदेवता नहीं लिखा।
ऐतिहासिक अभिलेखों में
Russell और Hira Lal (1916) के अभिलेख में कुलदेवता कई समुदायों में गोत्र से अलग, अपनी पहचान के रूप में दिखते हैं:
- भिलाला समुदाय के बारे में: हर परिवार की अपनी "कुल-देवी", जिसका प्रसाद केवल परिवार खाता है (विवाहित बेटियाँ भी)।
- भुइयाँ (रायगढ़) के बारे में: विवाह तय करते समय दोनों परिवारों के कुलदेव मिलाए जाते थे — एक हों तो विवाह नहीं।
- धूसर समुदाय के बारे में (पंजाब का एक उद्धरण): विवाह में एक ही गोत्र और एक ही कुलदेवता — दोनों से बचा जाता था।
इसका अर्थ
ये उदाहरण दिखाते हैं कि कुलदेवता और गोत्र दो अलग पहचान हैं, और कुछ समुदायों में विवाह के लिए दोनों अलग-अलग देखे जाते थे। एक गोत्र से "कुलदेवी कौन है" का अनुमान लगाना ठीक नहीं।
यह ब्रिटिश-काल की जनगणना-ethnography का ऐतिहासिक अभिलेख है — उस समय और क्षेत्र की स्थिति, आज की नहीं।
अपनी कुलदेवी या कुलदेवता परिवार के बड़ों, कुल-पुरोहित और परिवार के पूजा-स्थान की परंपरा से ही पता चलते हैं।
