उपनाम कहाँ से आए (अभिलेख)
Russell और Hira Lal (1916) ने ब्राह्मणों की कुछ उपाधियों के अर्थ इस तरह दर्ज किए हैं:
| उपनाम | अभिलेख में दिया अर्थ |
|---|---|
| पाण्डे | बुद्धिमान (wise man) |
| दुबे | दो वेदों का ज्ञाता |
| तिवारी | तीन वेदों का ज्ञाता |
| चौबे | चार वेदों का ज्ञाता |
| उपाध्याय | शिक्षक |
| अग्निहोत्री | अग्निहोत्र करने वाला |
| दीक्षित | दीक्षा देने वाला |
| पाठक | शिक्षक |
| जोशी | ज्योतिषी |
| बड़गैयाँ | बड़गाँव (गाँव) से |
एक उपनाम, अलग गोत्र
Crooke (1896) Sholapur के गुजराती ब्राह्मणों का एक पुराना विवरण उद्धृत करते हैं: उनके गोत्र भारद्वाज, कपिल और वसिष्ठ थे; उपनाम आचार्य, भट्ट, पण्ड्या, रावल, ठाकुर और व्यास; और एक ही उपनाम वाले परिवार आपस में विवाह कर सकते थे, बशर्ते उनका गोत्र अलग हो। यानी एक उपनाम के भीतर अलग-अलग गोत्र थे।
Russell (1916) की सूची में भी एक ही उपनाम कई अलग ब्राह्मण उपजातियों में दर्ज है — जैसे "मिश्र" कान्यकुब्ज, जिझौतिया, सरवरिया और उड़िया ब्राह्मणों में।
अलग उपनाम, एक गोत्र
Russell (1916) लिखते हैं कि ब्राह्मणों के वही गोत्र उनकी लगभग सभी उपजातियों में मिलते हैं। उपजातियाँ अलग, उपनाम अलग — पर गोत्र एक। गोत्र-प्रवर ग्रंथ भी गोत्रों को उपनाम से नहीं, प्रवर और गण से पहचानते हैं।
जब उपनाम ही विवाह-नियम बन गया
अभिलेख यह भी दिखाते हैं कि कुछ जगह उपनाम ने गोत्र का काम ले लिया था। Russell (1916) लिखते हैं कि कभी-कभी साधारण उपनाम कुल-नामों की जगह ले लेते थे, और एक उपनाम वाले स्वयं को संबंधी मानकर आपस में विवाह नहीं करते थे; एक दक्षिण भारतीय समुदाय के बारे में वे लिखते हैं कि गोत्र भूल चुके थे और विवाह उपनाम से तय होता था।
इसलिए कुछ परिवारों में "एक उपनाम में विवाह नहीं" की प्रथा हो सकती है। यह गोत्र-नियम नहीं, एक अलग परंपरा है।
यह ब्रिटिश-काल की जनगणना-ethnography का ऐतिहासिक अभिलेख है — उस समय और क्षेत्र की स्थिति, आज की नहीं।
निष्कर्ष
- उपनाम से गोत्र तय नहीं होता — न शास्त्र में, न अभिलेखों के अनुसार।
- एक उपनाम में कई गोत्र हो सकते हैं, और एक गोत्र कई उपनामों में।
- अपना गोत्र परिवार, कुल-पुरोहित और पुराने लेखों से पक्का करें — "अपना गोत्र कैसे पता करें" guide देखें।
