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FAQ
रविवार व्रत कथा — सामान्य प्रश्न
यही इस व्रत का सबसे विशिष्ट नियम है — दिन में केवल एक बार भोजन, और वह भी सूर्यास्त से पूर्व। यदि निराहार रहते हुए सूर्यास्त हो जाए, तो परंपरा कहती है कि अगले दिन सूर्योदय के बाद अर्घ्य देकर ही भोजन करें। साथ ही तले हुए तथा नमकीन पदार्थ वर्जित हैं — रविवार को "तेल-नमक से बचने" की जो परंपरा घर-घर में चलती है, वह इसी नियम से आती है।
हाँ, और वह इसी संग्रह में मौजूद है। सूर्याष्टकम् की फलश्रुति (श्लोक 10–11) सीधे कहती है — जो रविवार के दिन मांस व मधु का सेवन करता है वह रोगी रहता है; और जो स्त्री-संग, तैल, मधु व मांस का त्याग करते हैं, उन्हें व्याधि, शोक व दारिद्र्य नहीं होता और वे सूर्यलोक जाते हैं। यानी लोक-परंपरा और स्तोत्र-वचन दोनों एक ही बात कहते हैं — यह मेल अन्य वार-व्रतों में विरल है।
एक बुढ़िया हर रविवार आँगन को गोबर से लीपकर, भगवान को भोग लगाकर ही भोजन करती थी; गोबर वह पड़ोसन की गाय का लेती थी। एक दिन पड़ोसन ने गाय भीतर बाँध दी — बुढ़िया न लीप सकी, न भोग लगा सकी, और निराहार व्रत रखा। सूर्यदेव ने स्वप्न में दर्शन देकर उसे सोने का गोबर देने वाली गाय दी। पड़ोसन ईर्ष्यावश वह गोबर चुराने लगी; भगवान ने आँधी चलाकर गाय भीतर बँधवा दी। तब पड़ोसन ने राजा से शिकायत की और राजा गाय उठवा ले गया — पर उसी रात भगवान ने राजा को स्वप्न में समझाया। सुबह राजा ने सम्मान सहित गाय लौटा दी और नगर को रविवार व्रत रखने का आदेश दिया।
दो बातें। पहली — निष्ठा साधन नहीं माँगती। बुढ़िया के पास अपनी गाय तक नहीं थी, फिर भी उसका नियम वर्षों नहीं टूटा; और जिस दिन साधन छिन गया, उस दिन उसने भोजन ही छोड़ दिया। दूसरी — न्याय के लिए उसे लड़ना नहीं पड़ा। कथा में बुढ़िया एक बार भी किसी से नहीं भिड़ती; पड़ोसन को दंड भी भगवान सीधे नहीं देते, वे केवल आँधी चलाकर व्यवस्था बदल देते हैं, और राजा को समझाने के लिए भी स्वप्न ही चुनते हैं।
यह स्रोतों में असामान्य रूप से विशिष्ट रूप में मिलता है: "आँख की पीड़ा के अतिरिक्त अन्य सब पीड़ाएँ दूर होती हैं।" अधिकांश व्रत-कथाएँ ऐसा अपवाद नहीं लगातीं। यहाँ इसे ज्यों-का-त्यों दर्ज किया गया है, क्योंकि जो स्रोत कहते हैं वही लिखना उचित है; इसकी व्याख्या किसी स्रोत ने नहीं दी, इसलिए यहाँ भी नहीं गढ़ी गई।
व्रत का केंद्रीय कर्म सूर्य को अर्घ्य है। सूर्योदय के समय पूर्वाभिमुख खड़े होकर ताम्र (तांबे) के पात्र में जल, लाल पुष्प, अक्षत व रोली डालकर सूर्य को अर्घ्य दें। इसके बाद "ॐ घृणिः सूर्याय नमः" का जप, गुड़ व गेहूँ का भोग (सूर्य को यही सर्वाधिक प्रिय माना जाता है), सूर्याष्टकम् व आदित्य हृदयम् का पाठ, और अंत में व्रत कथा। कथा सुने बिना व्रत पूर्ण नहीं माना जाता।
आरंभ किसी भी रविवार से किया जा सकता है; परंपरा में रथ सप्तमी तथा मकर संक्रांति के आसपास आरंभ करना विशेष शुभ माना जाता है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि मंगलवार व्रत की तरह यहाँ इक्कीस की कोई निश्चित संख्या स्रोतों में नहीं मिलती — रविवार व्रत नियमित रूप से, यथासंभव लंबे समय तक रखने का विधान बताया जाता है, कोई निर्धारित गिनती नहीं।
सबसे प्रमुख सूर्याष्टकम् है, क्योंकि उसकी फलश्रुति स्वयं रविवार के नियम बताती है। इसके साथ आदित्य हृदयम् (वाल्मीकि रामायण का 31-श्लोकी स्तोत्र) तथा सूर्य चालीसा पढ़े जाते हैं; सामर्थ्य हो तो सूर्य अष्टोत्तर शतनामावली की अर्चना भी। दिनभर "ॐ घृणिः सूर्याय नमः" अथवा सूर्य गायत्री का जप चलता है।
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