गण 3 — आर्ष्टिषेणाः

आर्ष्टिषेणाः गण भृगु ऋषि-कुल का गण है। आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण के अनुसार इसका प्रवर है — भार्गव, च्यावन, आप्नवान, आर्ष्टिषेण, आनूप। सूत्रों में इसके 1 और रूप भी मिलते हैं। ग्रंथ ने इस गण में 40 नाम दर्ज किए हैं।

संक्षेप में

आर्ष्टिषेणाः गण भृगु ऋषि-कुल का गण है। आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराण के अनुसार इसका प्रवर है — भार्गव, च्यावन, आप्नवान, आर्ष्टिषेण, आनूप। सूत्रों में इसके 1 और रूप भी मिलते हैं। ग्रंथ ने इस गण में 40 नाम दर्ज किए हैं।

प्रवर

प्रवरऋषिकिस ग्रंथ के अनुसार
भार्गव · च्यावन · आप्नवान · आर्ष्टिषेण · आनूप5आश्वलायन, आपस्तम्ब, बौधायन, कात्यायन, मत्स्य पुराणतालिका का मुख्य
भार्गव · आर्ष्टिषेण · आनूप3आपस्तम्बविकल्प

स्वतंत्र मिलान: The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) (1917), अध्याय 195 — “Bhrigu, Chyavana, Apnuvana, Arshtishena, Rupi”. यह ऊपर दिए पाठ से अलग है।

इस गण में दर्ज नाम (40)

गोत्र-प्रवर ग्रंथों के अनुसार एक गण के गोत्रों में आपस में विवाह वर्जित माना गया है। सूची ग्रंथ में जैसी छपी है, वैसी ही है। नाम के आगे लिखे संकेत बताते हैं कि वह नाम किस ग्रंथ की सूची में है।

  1. 1अधितायिःम
  2. 2अनूपःका
  3. 3अरूपिःम
  4. 4आपस्तम्बिःम, का
  5. 5आर्ष्टिषेणःम, का
  6. 6आर्ष्टिषेणाःबो
  7. 7आश्वाभिःबो
  8. 8आश्वायतिःबो
  9. 9आश्वायनिःबो
  10. 10कटायनिःम
  11. 11कविःम
  12. 12काणायनःबो
  13. 13काण्डायनाःबो
  14. 14कार्दमायनःका
  15. 15कार्दमायनिःम, का
  16. 16गर्दभिःका
  17. 17गादार्भिःका
  18. 18गार्दभिःम
  19. 19गौराम्भिःबो
  20. 20ग्राम्यायनिःबो, का
  21. 21चटायनिःम
  22. 22चान्द्रायणःबो
  23. 23त्वान्द्रायणाः ?बो
  24. 24नैकपिःका
  25. 25नैकम्भिःका, म
  26. 26नैरथयःबो
  27. 27पैठकलायनःबो
  28. 28पौठकलायनःबो
  29. 29भल्विःम
  30. 30भाल्लविःका
  31. 31भृगवेदीयाःका
  32. 32भृग्वन्दीयःम
  33. 33भ्रालिःका
  34. 34मार्गपथःम
  35. 35मार्गपथाःका
  36. 36याम्यायनयःबो
  37. 37राभिःबो
  38. 38समुनायनाःबो
  39. 39सिह्वःबो
  40. 40सुमनायनाःबो

संकेत: आश्व = आश्वलायन · आप = आपस्तम्ब · बो = बौधायन · का = कात्यायन · म = मत्स्य पुराण. "?" = मूल छपाई साफ़ नहीं, नाम की पढ़त अनिश्चित।

भृगु-कुल के अन्य गण

स्रोत

पी. चेन्सल राव (सं.), गोत्रप्रवरनिबन्धकदम्बम् (1900), "प्रवराः, गोत्रगणाश्च", पृष्ठ 214–215 (archive.org leaf 254–255)।