गुजराती वाणिया समाज — उपजातियाँ, कुलदेवी और कुल-पुरोहित

गुजराती वाणियों की हर उपजाति के कुल-पुरोहित और कुलदेवता, पृष्ठ-संख्या सहित: मोढ़ का मोढेरा, नागर के हाटकेश्वर, लाड की आशापुरी, कपोल-सोरठिया की सामुद्री माता, श्रीमाली की वाघेश्वरी, पोरवाड की महालक्ष्मी, ओसवाल की ओसिया; और वीसा-दसा का अर्थ।

संक्षेप में

गुजरात के वाणिया समाज की हर उपजाति का अपना कुल-पुरोहित ब्राह्मण-समूह और कुलदेवता था। Gujarat Gazetteer (1901) के अनुसार मोढ़ वाणियों के कुलदेवता का स्थान मोढेरा है, नागर वाणियों के वडनगर के हाटकेश्वर, लाड वाणियों की आशापुरी, कपोल और सोरठिया वाणियों की सामुद्री माता, और सभी ओसवालों की कुलदेवी मारवाड़ की ओसिया।

उपजाति, कुल-पुरोहित और कुलदेवता

Gazetteer हर वाणिया उपजाति के साथ उसका नाम-स्रोत, कुल-पुरोहित (family-priests) और कुलदेवता (family-deity) लिखता है। नीचे वे उपजातियाँ हैं जिनके कुलदेवता दर्ज हैं:

उपजातिनाम / मूल (अभिलेख)कुल-पुरोहितकुलदेवी / कुलदेवतासंप्रदायपृष्ठ
कपोलमूल जूनागढ़ (गिरनार)कंडोलिया ब्राह्मणसामुद्री माता — मुख्य स्थान सुंदरी (ध्रांगध्रा)वल्लभाचार्य वैष्णव71
खडायताखडात (प्रांतिज के पास)खडायता ब्राह्मणखडात-महुडी (विजापुर के पास) के कोट्यर्केश्वरवल्लभाचार्य वैष्णव72
लाडलाट-देश (दक्षिण गुजरात का पुराना नाम)खेडावाल ब्राह्मणआशनाई (पेटलाद के पास) की आशापुरीवल्लभाचार्य वैष्णव72
मोढ़मोढेरामोढ़ ब्राह्मणकुलदेवता का स्थान मोढेरावल्लभाचार्य वैष्णव72
नांदोरानांदोद (राजपीपला)नांदोरा ब्राह्मणनांदोद के नंदिकेश्वर महादेववल्लभाचार्य वैष्णव72–73
नागरवडनगरनागर ब्राह्मणवडनगर के हाटकेश्वरवल्लभाचार्य वैष्णव; बाम नागर अधिकतर शैव73
नीमालगभग 200 वर्ष पहले मारवाड़ सेउदम्बरा ब्राह्मणईडर के पास शामळाजीवीसा: वैष्णव और जैन; दसा: वल्लभाचार्य73
पोरवाडश्रीमाल का उपनगर पोरवाडश्रीमाली ब्राह्मणश्रीमाल की श्री या महालक्ष्मीअंशतः वैष्णव, अंशतः जैन73
श्रीमालीश्रीमाल (अब भीनमाल, मारवाड़)श्रीमाली ब्राह्मणकुलदेवी: श्रीमाल की वाघेश्वरीवीसा श्रीमाली केवल जैन73
सोरठियासोरठ (काठियावाड़ का दक्षिणी तट)कंडोलिया ब्राह्मणसामुद्री — मुख्य स्थान सुंदरी (ध्रांगध्रा)वल्लभाचार्य वैष्णव74
ओसवालसब श्रावक (जैन)अधिकतर औदीच्य ब्राह्मणसभी ओसवालों की कुलदेवी: मारवाड़ की ओसियाजैन97
श्रीमाली श्रावकजैन श्रीमालीश्रीमाली ब्राह्मणदसा और लाडवा: महालक्ष्मी; वीसा: महालक्ष्मी और सचाई (Sachai)जैन98

जिनके केवल कुल-पुरोहित दर्ज हैं

इन उपजातियों के लिए Gazetteer कुल-पुरोहित तो लिखता है, पर कुलदेवता नहीं। इसलिए यहाँ कोई कुलदेवता नहीं दिया गया:

उपजातिनाम / मूल (अभिलेख)कुल-पुरोहितपृष्ठ
अग्रवालउज्जैन से लगभग चालीस मील उत्तर-पूर्व का अगर नगर; राजपूताना से आए; जनेऊ पहनते हैंअग्रवाल ब्राह्मण70
चित्रोडाराजपूताना का चित्रोडचित्रोडा ब्राह्मण70
देसावालडीसा; विवाह में आठ फेरेदेसावाल ब्राह्मण70–71
दीडूलगभग 300 वर्ष पहले मारवाड़ से सूरत आएश्रीमाली ब्राह्मण71
गुज्जर—श्रीमाली ब्राह्मण71
हरसोलाहरसोल (अहमदाबाद से लगभग तीस मील उत्तर-पश्चिम)हरसोला ब्राह्मण71
झारोला (झालोरा)मारवाड़ का झालोरझालोरा ब्राह्मण71
मेवाडामेवाड़ से आएमेवाडा ब्राह्मण72
नरसिंहपुरापालनपुर का नरसिंहपुरगुजरात के विभिन्न ब्राह्मण73
रायकवालधंधुका के पास रायकारायकवाल ब्राह्मण73
उम्मडलगभग दो सौ वर्ष पहले मारवाड़ सेऔदीच्य और अन्य गुजराती ब्राह्मण74
वायडापाटण के पास वायडवायडा ब्राह्मण74

वीसा, दसा और पांचा

  • अधिकतर वाणिया जातियाँ वीसा ("बीस") और दसा ("दस") में बँटी हैं। Gazetteer का अनुमान है कि वीसा संख्या में अधिक थे, इसलिए यह नाम पड़ा; कुछ में "पांचा" नाम का और छोटा भाग भी है (p. 70)।
  • मुख्य उपजातियाँ और उनके वीसा-दसा भाग प्रायः साथ भोजन करते हैं, पर आपस में विवाह नहीं करते; कई जगह यह रोक स्थानीय भागों तक जाती है — जैसे अहमदाबाद और सूरत के घोघवा मोढ़ आपस में विवाह नहीं करते (p. 70)।
  • 1901 में गुजरात के वाणियों में 38.9% मेश्री (वैष्णव) और 61.1% श्रावक (जैन) थे; अग्रवाल और बाम नागर वाणियों को छोड़कर कोई वाणिया जनेऊ नहीं पहनता था (p. 70)।
  • सभी मेश्री (गैर-जैन) वाणिया वल्लभाचार्य के पुष्टिमार्ग के अनुयायी दर्ज हैं (p. xxxvi)।

घर में कुलदेवी — "गोत्रज"

Gazetteer वाणियों के गर्भ-संस्कार में लिखता है कि पाँचवें महीने के गोद-भराई (lap-filling) संस्कार में गर्भवती स्त्री घर के देवता या "गोत्रज" के सामने आकर प्रणाम करती है, फिर उसकी गोद भरी जाती है (p. 93)। गुजरात में कुलदेवी के लिए यही "गोत्रज" शब्द चलता है — पर यह हर घर की अपनी कुलदेवी है, किसी गोत्र की तय सूची नहीं।

लाड वाणियों के बारे में एक और तथ्य: उनके पुराने उपनाम खाटा, खीचड़िया, पटारी और रोकड़िया थे, और पुराने नाम "दास" की जगह "राय" और "पाल" पर ख़त्म होते थे — जैसे कलानराय और धनपाल (p. 72)।

यह 1901 के Gujarat Gazetteer का ऐतिहासिक अभिलेख है — उस समय और क्षेत्र की स्थिति, आज की नहीं। हर परिवार की परंपरा इससे अलग हो सकती है।

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स्रोत

गुजराती वाणिया समाज — कुलदेवी और कुल-पुरोहित — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न