भूमिहार ब्राह्मण (pp. 41–42)
Sherring भूमिहार ब्राह्मणों के "कुछ" कुल, गोत्र और उपाधियाँ तीन अलग सूचियों में देते हैं — पंक्ति-दर-पंक्ति जोड़कर नहीं। इसलिए नीचे की सूचियों में किसी कुल को किसी गोत्र या उपाधि से नहीं जोड़ा गया:
| सूची | नाम (ग्रंथ में जैसे छपे) |
|---|---|
| गोत्र | गर्ग, गौतम, शांडिल, कश्यप (Kâsyap), भारद्वाज, वत्स |
| कुल | Eksadiya, Sankarwar, Kinwar, Bemwar, Dunwar, Chaudhari, Kulha, Pipra, Jaithariya, Rausadiya, Kastwar |
| उपाधियाँ | मिश्र, दीक्षित, उपाध्याय, पांडे, तिवारी, पाठक, भरसी-मिश्र (Bharsi-Misr) |
भूमिहार कुल जिनका गोत्र और शाखा अभिलेख स्वयं बताता है
Sherring के अनुसार गौतम गोत्र का Pipra कुल माध्यंदिन शाखा के भूमिहारों से विवाह-संबंध रखता है (pp. 41–42)।
| कुल | गोत्र | उपाधि / शाखा | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| Pipra (बनारस में सबसे प्रमुख) | गौतम | मिश्र; कौथुमी शाखा (सामवेद); प्रवर: गौतम, आंगिरस, औतथ्य | 41 |
| Jaithariya | कश्यप | माध्यंदिन शाखा (यजुर्वेद) | 42 |
| Chaudhari | भारद्वाज | पांडे; माध्यंदिन शाखा (यजुर्वेद) | 42 |
| Kolha | कश्यप | माध्यंदिन शाखा (यजुर्वेद) | 42 |
शाकद्वीपी ब्राह्मण (p. 103)
Sherring शाकद्वीपी ब्राह्मणों के "कुछ" कुल, गोत्र और उपाधियाँ पंक्ति-वार देते हैं, और लिखते हैं कि ये सब वर्ग आपस में व्यवहार और विवाह करते हैं। तीन कुलों के आगे गोत्र खाली छोड़ा गया है:
| कुल | गोत्र | उपाधि |
|---|---|---|
| Urwar | भारद्वाज | मिश्र |
| Khantwar | कौण्डिन्य | पाठक |
| Makhapawar | — (खाली) | मिश्र |
| Bhaluniyar | शांडिल | पंडित |
| Chheriyar | गर्ग | पांडे |
| Panchhaiya | शांडिल | मिश्र |
| Paraniyar | शांडिल | पांडे |
| Dedha | कौण्डिन्य | मिश्र |
| Bilsaya | काश्यप | मिश्र |
| Adrawar | भारद्वाज | मिश्र |
| Onariyar | — (खाली) | मिश्र |
| Jamwart | — (खाली) | पाठक |
| Thakurmirao | शांडिल | पाठक |
| Sri Mauriyor | पराशर | पांडे |
| Anwadhiyar | वत्स | मिश्र |
| Kukurandha | पराशर | मिश्र |
| Deokuliyar | भारद्वाज | पांडे |
| Pawaeyar | भारद्वाज | मिश्र |
मथुरा के चौबे (pp. 103–104)
- Sherring के अनुसार "चौबे" उपाधि का मूल अर्थ है चारों वेद पढ़ सकने वाला; यह उपाधि कई ब्राह्मण समाजों में मिलती है, पर मथुरा के चौबे एक अलग समाज हैं (p. 103)।
- उनकी परंपरा: किसी प्राचीन काल में उनके पूर्वज कुछ समय के लिए मथुरा छोड़कर श्रीकृष्ण के पितामह राजा शूरसेन (Sarsen) की शरण में यमुना-तट पर जटेश्वर (Jateshwar) के पास रहे (p. 103)।
- मथुरा के चौबे पहले सात गोत्रों में बँटे हैं, हर गोत्र का एक मुख्य कुल, और ये सात कुल आगे 64 छोटे कुलों में (p. 104)।
- मैनपुरी आदि में इन्हें "मथुरिया" कहा जाता है, ताकि उन चौबों से अलग पहचाने जाएँ जिनका मथुरा समाज से संबंध नहीं; मैनपुरी वाले मूलतः चित्तौड़ से आए (p. 104)।
| मुख्य कुल | गोत्र |
|---|---|
| Kakora | दक्ष (Daksha) |
| Mihari | कौत्स (Kautsa) |
| Purohit | सौश्रवस (Sausravas) |
| Kahi | वसिष्ठ |
| Battiya | भार्गव (Bhargau) |
| Uthauhiya | भारद्वाज |
| Gagoliya | धूम (Dhûm) |
ध्यान रखें
यह 1872 का ऐतिहासिक अभिलेख है — लेखक ने बनारस में मिली जानकारी दर्ज की, और स्वयं कहते हैं कि सूचियाँ पूरी नहीं। उपाधि (title) गोत्र नहीं: एक उपाधि कई गोत्रों में मिलती है। अपना गोत्र परिवार और कुल-पुरोहित से पक्का करें।
FAQ
भूमिहार, शाकद्वीपी और मथुरा के चौबे — गोत्र और उपाधियाँ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Sherring (1872) छह गोत्र गिनाते हैं — गर्ग, गौतम, शांडिल, कश्यप, भारद्वाज और वत्स — और लिखते हैं कि यह "कुछ" की सूची है (p. 41)।
अभिलेख कुलों, गोत्रों और उपाधियों को अलग-अलग सूचियों में देता है; केवल कुछ कुलों का गोत्र साफ़ लिखा है — जैसे Pipra गौतम, Jaithariya और Kolha कश्यप, Chaudhari भारद्वाज (pp. 41–42)। बाक़ी परिवार से पक्का करें।
Sherring की तालिका में भारद्वाज, कौण्डिन्य, शांडिल, गर्ग, काश्यप, पराशर और वत्स गोत्र दर्ज हैं, मिश्र, पाठक, पांडे और पंडित उपाधियों के साथ (p. 103)।
सात: दक्ष, कौत्स, सौश्रवस, वसिष्ठ, भार्गव, भारद्वाज और धूम (Dhûm) — हर एक का एक मुख्य कुल (p. 104)।
Sherring के अनुसार मूल अर्थ चारों वेद पढ़ सकने वाला; यह उपाधि कई समाजों में है, पर मथुरा के चौबे एक अलग समाज हैं (p. 103)।
